गीत

बन परिंदा मन उड़ा किस ओर है।

हाथ में आती न इसकी डोर है।

रूबरू हूँ मैं हक़ीक़त से सदा,

जानती हूँ रंग जीवन से गए।

बेड़ियाँ मजबूरियों की पाँव में,

ख़्वाब आँखों में पले क्यों नित नए।

अब निराशा मन बसी घनघोर है।

मैं फँसी हूँ कशमकश में द्वंद में,

ज़िंदगी की उलझनों के जाल में।

फ़र्ज़ से हैं पंख मेरे बँध चुके,

छू न पाऊँ मैं गगन इस हाल में।

दूर हाथों से हुआ हर छोर है।

छल रहे हों जब उजाले हर तरफ,

तब अँधेरे ही भले हैं रात के।

दीप मन में मत जलाओ आस के,

हर तरफ मौसम हैं अब बरसात के।

दूर तक दिखती न कोई भोर है।

–अनीता सिंह”अनु”