कहानी मूर्ति बाज मंत्री की

यह बात तो हमेशा की है। कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। बात बहुत सामान्य है। एक पार्टी के भीतर कोई एक नेता रहता था। बल्कि नेता के भीतर एक पार्टी रहती थी। या यूं कहें पार्टी और नेता दोनों एक दूसरे के भीतर ही रहते थे। या यह भी कह सकते हैं कि पार्टी और नेता दोनों एक दूसरे के भीतर नहीं रहते थे। बहुत गड़बड़ झाली मामला था। क्या तो कहें और क्या छोड़ें! नेता जी मंत्री बन गए और वे हर किसी को मूर्ति बनाने लगे।  उन्हें जो कोई भी नजर आता, वे उसकी मूर्ति बना डालते। जो कोई वोटर दिखता, वे उसकी मूर्ति अपनी आंखों में उतार लेते। उनके चुनावी वादे, संकल्प आदि भी मूर्तियों का रूप धरे सब जगह नजर आते। वे जहां देखो वहीं मूर्तियां ही सजाते। कई चौक-चौराहों, सड़कों-वीरानों पर उन्होंने अपनी स्वयं की मूर्तियां भी लगा दी थी। इस तरह वे ख्यातिनाम मूर्तिबाज हो गए। वे ऐसी मूर्तियां बनाते कि उनकी मूर्तियों को देखकर, उनके जिंदा होने का भ्रम बना रहता। उन्होंने भ्रम की दुनिया ही बना डाली! उनकी बनाई मूर्तियां ऐसे लगती जैसे वे अभी बोल पड़ेगी, लेकिन असल में वे कभी बोल नहीं पाती। मूर्तियां कभी बोली है? मंत्री जी बोलने दे ना तब! वे जिस किसी दिशा में अपनी उंगली उठाते उसी दिशा के सभी व्यक्ति मूर्तियां बन जाते। कवि, लेखक, चित्रकार, अफसर और कलाकार! ये तो उनके आगे बस मूर्ति मात्र ही बने रहते! ऐसे महान यशस्वी मूर्ति बाज मंत्री जी!

समय आया। एक दिन मंत्री को लगा कि अब उसकी मृत्यु निकट है। वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाएगा। मृत्यु को सामने देखकर मूर्ति बाज मंत्री बहुत परेशानी में पड़ गया। साक्षात मृत्यु को देखकर डर गया। घबराकर उसने सोचा कि आखिर किया क्या जाए? तब यमदूतों को भ्रमित करने के लिए उसने एक योजना बनाई! उसने हुबहू अपने जैसी 20 मूर्तियां बनाई और वह खुद भी मूर्तियों के बीच जा बैठा! सांस रोके यमदूतों का इंतजार करने लगा। जब यमदूत उसे लेने आए तो एक जैसी 21 आकृतियों को देखकर दंग रह गए। आश्चर्य के सागर में गोते मारते यमदूतों ने हाथों-हाथ अपनी उंगलियों को दांतों नीचे डालकर चबा डाली। वे पहचान नहीं कर पा रहे थे कि उन मूर्तियों में से असली मंत्री कौन है? मनुष्य होता तो वे पहचान लेते लेकिन इस मंत्री नुमा जंतु को आखिर पहचाने कैसे? बड़े चक्कर में फंस गए। अब करें तो क्या? अगर इस मंत्री के प्राण नहीं ले पाए, तो सृष्टि का नियम टूट जाएगा। एक-एक मूर्तियों को तोड़ कर देखना भी नियम विरुद्ध है। अचानक एक यमदूत को मंत्री के सबसे बड़े दुर्गुण अहंकार को परखने का विचार आया। उसने मूर्तियों को देखते हुए कहा- कितनी सुन्दर मूर्तियां बनाई है। एक से बढ़कर एक! लेकिन एक मूर्ति में जरा सी त्रुटि रह गई है! काश मूर्ति कार मेरे सामने होता, तो मैं उसे बताता कि गलती कहां हुई है? तभी मंत्री का अहंकार जाग गया। वह फट से बोल उठा- कौन सी गलती? कोई गलती नहीं हुई है! कोई नेता! कोई पार्टी बाज! मेरी कोई गलती नहीं ढूंढ़ सका है! इतना सुनना था कि यमदूत ने मंत्री को पकड़ लिया। अपनी बाहों में जकड़ लिया। यमदूत ने कहा- तुमने हर एक जीव को मूर्ति बनाकर बेजान कर दिया। मूर्तियां जिंदगी में कभी नहीं बोल पाई। इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने विक्रम की पीठ पर एक जोरदार धौल मारा। एक भयंकर कहकहा मारते हुए बेताल संसद की छत से उल्टा लटक गया।

— रामविलास जांगिड़,18, उत्तम नगर, घूघरा, अजमेर (305023) राजस्थान