वानी बिस्तर पर बुरी तरह से छटपटा रही थी।वह कभी दायें करवट लेती कभी बायें करवट, पर किसी भी करवट उसे राहत नहीं मिल रही थी । चेहरे पर बेचैनी,घबराहट के साथ पसीने की महीन बूंदें झिलमिला रही थीं और सांसें —सांसें धौकनी के माफिक चल रही थीं। विशालऽऽऽ, एक तेज़ चीख़ के साथ वह उठकर बैठ गई थी। घबराई आँखों से उसने इधर-उधर देखा—विशाल—विशाल—तुम ठीक हो न—?विशाल—?
नींद से पूरी तरह से जागकर उसने अपना सिर पकड़ लिया था—ओह!!!वह तो अपने ही घर में है,यानि वही सपना—फिर—से। उसकी आँखों के सामने वह खौफनाक मंज़र नाच उठा था —वे गाड़ियों के शोर से चीखती सड़कें
साँय—साँय करती गाड़ियों की तेज़ रफ्तार और एक तेज़ चीख के साथ सड़क पर बिखरा—ढेर सारा खू–न– उफ़!
उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था।उसने फिर वही सपना देखा था,वही खौफनाक सपना—जिसने उसकी हंसती जिन्दगी में हमेशा के लिए ग्रहण लगा दिया था—कभी न खत्म होने वाला ग्रहण।
कुछ देर तक वह यूँ ही शून्य में ताकती रही थी। शायद मन अतीत की संकरी गलियों में उलझ सा गया था कि अचानक नज़र घड़ी पर गई तो वानी हड़बड़ाकर उठ बैठी, हड़बड़ाहट में उसने अपने लम्बे, बिखरे बालों को बेतरतीबी से बांधा। आज बैंक में उसकी इंपॉर्टेंट मीटिंग थी। कही वह लेट न हो जाएं यह सोचकर वह बाथरूम की ओर भागी।
‘मीटिंग है’ यह सोचकर वानी ने ग्रे और ग्रीन कांबिनेशन वाली लेनीन की साड़ी पहन लिया था । बैंक पहुंच कर उसने राहत की सांस ली। उसका प्रेजेंटेशन तैयार था ।लैपटॉप लेकर वह मीटिंग एरिया में पहुंच गई थी । सीनियर्स के साथ-साथ जूनियर्स भी उसकी प्रेजेंटेशन से बहुत ही खुश थे, बहुत ही इंप्रेस थे । वास्तव में वानी एक बहुत ही सुलझी हुई, टैलेंटेड, वक्त की पाबंद, अपने काम के प्रति चौकस असिस्टेंट मैनेजर थी। ईश्वर ने उसे कार्य करने की काबिलियत के साथ सुन्दरता और सौम्यता के गुणों से भी नवाजा था।
किंतु आज न जाने क्यों मीटिंग में वह कई बार अचकचा गई थी। एक जोड़ी आंखें लगातार उसकी तरफ, उसके चेहरे पर गड़ी हुई थी और जब भी वानी की आँखें उसकी आंखों से टकराती ‘उसकी’ आँखें हल्के से मुस्कुरा देती थीं ।ये—ये—?शायद वही होगा जो ट्रांसफर होकर यहां आने वाला था,जिसकी चर्चा कुछ दिनों से ऑफ़िस में हो रही थी,वानी ने मन ही मन सोचा । खैर— जल्दी-जल्दी उसने अपना प्रेजेंटेशन खत्म किया लेकिन— वह उन आंखों की गर्मी को अब भी अपने शरीर के इर्द-गिर्द महसूस कर रही थी।
वानी ने अपने केबिन में पहुंच कर जरूरी फाइलों को निपटाया और सिर को चेयर पर टिकाते हुए आंखें मूँद लीं। केबिन का दरवाजा खुलने की आवाज हुई तो उसने सोचा कैलाश आया होगा चाय देने के लिए, उसने आंखें मूंदे हुए ही कहा-” कैलाश! चाय टेबल पर रख दो, और हां! यदि कैंटीन में कुछ गरम हो तो प्लीज लेते आओ, आज मैं बहुत थक गई हूं।”
“वानी जी! ये मैं हूँ कैलाश नहीं,कहिए तो मैं ही आपके लिए कुछ ले आऊँ?एक नई आवाज सुनकर वानी अचकचा कर चेयर पर सीधे बैठ गई।
आपकी प्रेजेंटेशन तो काबिले तारीफ रही, क्या कॉन्फिडेंस था? क्या पॉलिसी की
बारीकियां थीं? भाई वाह! मैं तो आपका फैन हो गया।” ‘वह’ अपनी ही रौ में बोले जा रहा था जो मीटिंग के दौरान बार-बार उसकी तरफ देख कर मुस्कुरा रहा था और अब भी उसकी आँखों में शरारत का छोटा सा कतरा मचल रहा था जैसे नीले आसमान में कोई मनचला, आवारा बादल का टुकड़ा—।
“तु—म—? मेरा—मेरा—मतलब है आप—? आप यहां क्या कर रहे हैं—? हड़बड़ाहट में वानी को समझ में नहीं आया कि वह उसे तुम कहे या आप । लेकिन चेहरे पर नाराज़गी के भाव स्पष्टत: परिलक्षित हो रहे थे । एकान्त चिंतन में विघ्न से उपजा रोष उसके चेहरे पर था।
वानी ने अपनी आवाज का रूखापन शायद खुद भी महसूस किया सो आवाज़ में नरमियत लाते हुए उसने कहा-“जी कहिए”
“अजी! क्या कहने है आपके,लाजवाब प्रेजेंटेशन रहा आपका । इस नाचीज़ को राज कहते हैं— राज सक्सेना।” कहते हुए राज ने अपना दाहिना हाथ बढ़ा दिया,
राज जिस बेतकल्लुफ़ी और नाटकीय अंदाज में बातें किए जा रहा था उससे वानी की त्योरियां चढ़ती जा रही थी। हुँह—ये समझता क्या है अपने आपको?,चला आया मुँह उठाकर। सोचते हुए वानी ने किसी तरह से अपने गुस्से पर काबू किया और दो टूक जवाब देते हुए कहा -“देखिए! लंच टाइम ओवर हो रहा है हम बाद में बातें कर सकते हैं।”
“श्योर!व्हाई नॉट ” कहते हुए उसने फिर से मुस्कुरा कर एक भरपूर दृष्टि वानी पर डाली और केबिन से बाहर निकल गया ।
हद है यार—! क्या मुसीबत है ये,अपने काम से काम मतलब क्यों नहीं रखता ये लड़का? बिना पूछे केबिन में धावा बोल दिया ऊपर से बत्तीसी भी दिखा रहा है। वानी मन ही मन भुनभुना उठी थी।
पर यह क्या—? यह तो अब हर रोज़ की बात हो गई थी ,कभी बैंक जाते समय, कभी लंच टाइम में, और कभी-कभी तो बैंक से घर लौटते समय कहीं न कहीं राज टकरा ही जाता था और अपने उसी बेफिक्र से अंदाज में बस चालू हो जाता। न जाने कितनी बातें वो करता था बिना थके— कुछ ज़रूरी और बहुत सारी गैरज़रूरी चपड़-चपड़—वानी से सामना होते ही वह शुरु हो जाता-“वाह!वानी जी!, आप तो बहुत पंक्चुअल है, भई! क्या ड्रेसिंग सेंस है आपका—चलिये कैन्टीन में एक-एक कप कॉफी हो जाए— “और न जाने क्या-क्या।
वानी कभी उसे घूरकर और कभी स्पष्ट शब्दों में ‘ना’ कह कर उससे अपना पीछा छुड़ाने की कोशिश करती,लेकिन राज से सामना होते ही वानी न जाने क्यों असहज हो उठती उसका सारा आत्मविश्वास सर्दी की धूप की तरह झट से गायब हो जाता।
वानी जब बैंक से घर लौट कर घर के कामों को निपटाती तो बहुत देर तक खुद से बड़बड़ करती रहती और बड़बड़ का विषय होता— राज सक्सेना—घर आकर भी राज की बातें वानी के कानों में गूंजती रहती- “क्या बात है वानी जी! काफी मेनटेन कर रखा है अपने आप को—आप इतनी चुप सी क्यों रहती हैं?—भई! मेरा तो उसूल है जिंदगी के हर पल को जिंदादिली से इंजॉय करना चाहिये, आपका क्या ख्याल है वानी जी?”
राज की एक-एक बातें किसी सिनेमा की रील की तरह उसकी आंखों से होते हुए दिल में उतरती चली जाती और उसके दिल में जितनी बार ‘राज’ नाम की सरगम बजती वह खुद पर उतना ही झुंझला उठती किन्तु विधाता के मुख पर सौम्य, वात्सल्यपूर्ण मधुर मुस्कान थिरक उठती।
लेकिन आज उसने ठान लिया था कि इस चपड़-चपड़ महाशय को एक करारा जवाब देगी ताकि आइंदा से वह उसके पीछे न पड़े। हाँ! बस—बहुत हो गया अब।
वानी सोच रही थी कि ऑफ़िस में वो इतना रिजर्व रहती है कि उसका स्टाफ़ हंसी मजाक तो दूर उससे बात करने में कई बार सोचता है और ये कल का आया लड़का—? इसकी इतनी मजाल?
लंच टाइम में वानी राज के केबिन में पहुंच कर कुछ ज़रूरी बात करने की बात अभी कह ही रही थी कि-“वाह!वाह! ज़हे नसीब,भई आज सूरज निकला किधर से है? कहिए वानी जी! कहीं कॉफी पीने चले?” उसकी बकबक शुरु हो गई । वानी ने नजरें घुमा कर इधर-उधर देखा आसपास की कई टेबल खाली थी उसने आश्वस्त होकर कड़े शब्दों में कहा-“सुनिए मिस्टर राज!जिस तरह से आप बिना वजह मुझसे बात करने की जो कोशिश करते हैं न ! वह बंद कीजिए मैं यहां जॉब करती हूं मैं नहीं चाहती कि लोग बिना वजह किसी तरह की गॉसिप करें। आप अपने काम से काम मतलब रखिए ।आइंदा बिना वजह मुझसे बात करने की कोशिश मत कीजिएगा, समझे आप?” गुस्से में उसकी आवाज बेकाबू हुई जा रही थी लेकिन एक सांस में उसने अपनी बातें पूरी की और दनदनाते हुए अपने केबिन में जाकर किसी टूटे हुए शाख की तरह चेयर पर ढह सी गई । उसकी सांसे अब भी तेज़ चल रही थीं। मन की खीझ और बेबसी आँखों के रास्ते बहुत देर तक बहती रहीं लेकिन मन का गुबार निकाल कर भी उसका मन शांत नहीं हुआ। एक अजीब से दर्द से वह छटपटा रही थी—एक अनजाना सा दर्द—पर इस दर्द की वजह और अपने मन की उलझन से वह पूरी तरह अंजान थी ।
दूसरे दिन नियत समय पर वानी बैंक पहुंची। अपना काम भी किया लेकिन पूरे दिन मन में एक अजीब सी बेचैनी होती रही । कई एक बार केबिन से बाहर निकल कर उसकी आंखें भीड़ में किसी को तलाशती रही । उसके मन के भीतर क्या चल रहा था उसे खुद भी पता नहीं चल रहा था ।राज पर उसने अपनी नाराजगी तो ज़ाहिर कर दी थी पर अब उसके न दिखने पर—उसका मन चंचल क्यों हो रहा था? आज काम करते हुए भी मन में शांति नहीं थी, एक झुंझलाहट, एक ऊब थी । उसने एक नहीं कई एक बार बाहर निकल कर उस मुस्कान को तलाशने की कोशिश की, तलाश मुकम्मल तो न हुई पर उसके मन की निराशा गहरी होती चली गई। राज बैंक तो आता लेकिन वह हर दफे कोशिश करता कि वानी से उसका आमना-सामना न हो, कभी दोनों टकराते भी तो राज बगल से इस तरह से निकल जाता जैसे वह वानी को पहचानता तक नहीं है। राज की बेरुखी वानी के लिए असह्य हो उठी। वह अंदर ही अंदर घुटने लगी थी,बिन पानी की मछली की तरह छटपटाने लगी थी। राज़ का नजरअंदाज करना उसे अंदर तक चुभने लगा था ।
वानी जिस मानसिक दौर से गुजर रही थी उसका खामियाजा उसके स्वास्थ्य को चुकाना पड़ा। वह बहुत दिनों से अपने आप से लड़ रही थी ।सच तो यह था कि बैंक में वह बिना वजह राज से चिढ़ती रहती थी, उससे उखड़ कर बात करती थी पर उसके मन के एकांत कोने में राज हर वक्त मुस्कुराता रहता और—और वानी की बेचैनी की वजह भी यही थी। वो अपने मन की इस चंचलता से बुरी तरह से डर रही थी । कुछ साल पहले ही तो उसकी जिन्दगी की खुशियाँ काल के गाल में समा चुकी थीं और अब एक बार फिर—वही डर— किसी को फिर से खोने का डर—जैसे—उसने विशाल को खो—।
बुखार की वजह से उसने एक सप्ताह के लिए बैंक से छुट्टी ले ली पर उसे पता था कि घर में भी उसे मानसिक शान्ति नहीं मिलेगी खैर—। शाम की चाय बनाकर वानी हॉल में बैठी थी। हल्का म्यूजिक उसने प्ले कर दिया था ताकि वह दिल और दिमाग के दंगल से बचकर कुछ देर सुकून से बैठ सके कि तभी कॉल बेल बजी और सामने जिसको देखा उसे देखकर वह बुरी तरह से अचकचा गई-” आ—प मेरा मतलब है तु—म—?,वह फिर हकला उठी।
आज राज के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं थी बल्कि एक अलग किस्म की संजीदगी थी उसने भारी आवाज में पूछा-” अंदर तो आ सकता हूं न? वह दरवाजे से एक तरफ हट गई।
वानी! तुम कैसी हो?
वानी को राज की फिक्र और उसका ‘तुम’ सम्बोधित करना उसे अंदर तक पिघला गया। लगा सब कुछ भूल-भाल कर वह उसके सीने से जा लगे और कहे मुझे संभाल लो राज, अकेले यूँ जिन्दगी की लड़ाई लड़ते-लड़ते मैं थक गई हूं ,मुझे तुम्हारा साथ चाहिये राज—सिर्फ़ तुम्हारा साथ—।
“वानी! तुम ठीक तो हो? कहाँ खो गई? राज ने उसके कन्धे को हौले से हिलाते हुए पूछा था।
“ठीक हूँ।” कांपती आवाज़ को संयत करते हुए वानी ने छोटा सा जवाब दिया।
सुनो वानी! अब मैं जो कहने जा रहा हूं उसको ध्यान से सुनो। मैं जितने दिनों तक बैंक में तुमसे हंसी मजाक करता रहा, तुम्हें परेशान करने या किसी गलत सोच के कारण नहीं मैं सिर्फ़ इतना चाहता था इस उदास से चेहरे पर मैं मुस्कान की नन्ही सी किरण बिखेर सकूं। वानी अपनी बोझिल सी आँखें राज के चेहरे पर टीकाए दम साधे उसकी बात सुन रही थी। आज उसमें विरोध करने की ज़रा भी हिम्मत नहीं थी।
वानी! मैं तुमसे प्यार करता हूं बहुत—बहुत प्यार— तुम्हारे साथ अपनी पूरी जिन्दगी बिताना चाहता हूँ। नहीं– नहीं–तुम्हें कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है । वानी के कांपते होठों पर राज ने अपनी अंगुलियां धर दीं ।आज तुम मेरी बात सुनो मैं सब कुछ जानता हूं तुम्हारे बारे में—सब कुछ—, किस तरह से विशाल का एक्सीडेंट हुआ, किस तरह हिम्मत से तुम अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जी रही हो ।मैं तुम्हारी सादगी और हिम्मत का कायल हूं वानी!
तुम्हारे लिए मेरे मन में दया नहीं सम्मान है मैं तुम्हें वो सारी खुशियाँ देना चाहता हूँ जिस पर तुम्हारा भी हक है।एक बार—सिर्फ़ एक बार मुझ पर विश्वास कर लो।बोलो! तुम अपनी पूरी जिंदगी इस बेवकूफ राज के साथ बिताना चाहोगी—?बोलो न वानी—राज बोलते-बोलते भावुक हो उठा था। उसकी आँखों में प्रेम के सच्चे मोती झिलमिला रहे थे और—वानी—वानी तो निहाल हुई जा रही थी। उसने राज को ज़ोर से भींच लिया,वर्षों का जमा दर्द स्नेह का स्पर्श पाते ही आँखों के रास्ते बह निकला ।अब उसके मन में कोई डर नहीं था। उसके मन की सारी उलझने जैसे एक झटके में सुलझ गई थीं। एक बार फिर—हाँ— एक बार फिर जिन्दगी ने उसके मन के दरवाजे पर दस्तक दिया था। उसने भी मन के बंद दरवाजे खोल दिये थे और जिन्दगी एक बार फिर से मुस्कुरा रही थी। हाँ—एक बार फिर से—
समाप्त
डॉ रत्ना मानिक
टेल्को, जमशेदपुर