प्रसिद्ध मुहावरा है आ बैल मुझे मार की तरह ही देश और समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो भीषण आपदा कोरोना को आमंत्रण दे रहे है ” आ कोरोना मार “l दूसरी लहर की विभीषिका झेलने के बाद भी ,संभावित तीसरी लहर से बेखौफ है l भीड़ बुलाई भी जा रही है और आ भी रही है l भीड़ देख कर आनंद की अनुभूति हो तो फिर क्या कहने l मास्क की जगह मस्का , प्रतिबंध और नियम तोड़ने का चस्का l ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं’ ऐसी ही एक कहावत है। इसका सीधा सा अर्थ है कि सबल और समर्थ व्यक्ति पर कोई दोष नहीं लगता।कोरोना काल में मोबाइल पर एक मैसेज खूब चला दो गज की दूरी जरूरी ,पर अच्छे अच्छों को नहीं पता दो गज मतलब कितने फिट या मीटर l वर्तमान की शिक्षा पद्धति तो इंच/फिट और मीटर सिखाती है l मैसेज सुनते रहे पर पालन नहीं किया करते भी कैसे ? कुछ भी अता पता नहीं l कोरोना को भीड़ पसंद है और इंसान को भीड़ में जाना l कुछ लोग तो भीड़ में सिर्फ माहौल देखने जाते है , कोरोना गले लगा लेते है l इनके मास्क लगाने की चिंता शासन प्रशासन करे l अपने आप को जागरूक कहने वाले भी जाग कर रुक जाते है l वेक्सीन लगाने के लिए कितने पापड़ बेलना पड़े प्रशासन को ,जिन्हे अपनी चिंता नहीं वो भी सरकार के भरोसे आखिर करे तो क्या ? कहां कहां हथेली पर सरसों लगाये l
मुआ कोरोना छलिया बाबू से कम नहीं , रूप बदल बदल कर रहा है छल पर छल l क्यों नहीं छलेगा ,हम वायरस को नहीं देख सकते पर वायरस हमें देख रहा है हमारी हर हरकत पर नजर है उसकी l मास्क हटाते ही कब शरीर में प्रवेश कर जाता है पता ही नहीं चलता और जकड़ लेता है l आप नजरे चुराकर हाथ न धोये पर उसकी नजर से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है ,विश्व की पुलिस भी उसे पकड़ नहीं पा रही है कोरोना के आतंक से हर कोई आतंकित है l आपकी हर गलती पर मौत की सजा सुनाता है l दोस्त शर्मा जी ने बताया कि कोरोना वायरस ने मेरे सपने में आकर कहा की मैं कोरोना वायरस हूँ इंसान की बिगड़ी आदतों को सुधारने आया हूँ जो न रखेगा संयम उसे सबक सिखाने को अवतरित हुआ हूँ पिछले दो सालों से कोशिश कर रहा हूँ सुधर जाओ इंसानी फि तरत ऐसी है कि मैं थोड़ा नार्मल होने की कोशिश करता हूँ , सबक सिखाकर इंसान उन्हीं गलतियों को पुन: दोहराने लगता है और मझे फिर अपना वायरसपन दिखाना पड़ता है मैं मानता हूँ कि मैंने जन , तन, मन और धन का खूब नुकसान किया l मैं विदा लेने की सोचता हूँ पर मिलनसारिता और चटोरेपन और चुनावी धक्कापेल से मन पसीज जाता है की अभी भी नहीं सुधरे एक बार रूप बदल कर फिर देखता हूँ और फिर से अपने काम पर लग जाता हूँ और मजबूरन प्रतिबंध लगाने पड़ते है सरकार को l इंसान लाइन और लेंथ पर आने लगता हैl कोरोना वायरस कहने लगा कुछ प्रतिबंध तो स्थायी कर देना चाहिये जैसे शादी और चुनाव में भीड़ l जो कहा सब उसे वायरल कर देना lइंसान सुधर जाये और मैं पृथ्वी लोक को छोड़ कर चला जाऊं पर क्या करूं इंसानों ने कसम खा रखी है हम नहीं सुधरेंगे l एक गाने के बोल है –बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया और हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया l इस तरह ही कई लोग बर्बादियों के जश्न मनाये जा रहे है और फिक्र को हवा में उड़ा रहे है l
संजय जोशी ” सजग “