बहुत पहले एक फिल्मी गाना जगह जगह सुनाई पड़ता था “पतझड़, सावन बसंत ,बहार पांचवां मौसम प्यार का ,इंतजार का —– किंतु देश की वर्तमान परिस्तिथियों को दृष्टिगत रखते हुए मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि आज की तिथि में कोई गीतकार गाना बनाये तो यही लिखेगा “पतझड़ ,सावन ,बसंत बहार पांचवां मौसम चुनाव का दिखावटी लगाव का ।”
वास्तव में देखा जावे तो यही सच्चाई है कि इस देश में मौसम भी अपने अपने हिसाब से परिभाषित होता है ।जब किसी पुराने राजनैतिक दल के वर्षों पुराने कार्यकर्ता लगातार अपने दल को झोड़कर पलायन करते हैं तो ,नए नए दल में पद प्राप्ति के लिए लालायित रहते हैं तब हमारे राजनीति के काकाजी हमसे कहते हैं बेटा बहुत बुरे दिन आ गए हैं लगता है यही हमारे लिए “पतझड़ ” का मौसम है ।तब हम काकाजी से कहते हैं काकाजी भगवान पर भरोसा रखो प्रत्येक दुख के बाद सुख आता है जो आज दल झोड़कर पतझड़ का मौसम ला रहे हैं वही बाद में उन दल वालों के लिए भी पतझड़ पैदा करेंगे ऐसा मौसम कर देंगे कि उनके यहां बरसों तक सत्ता की बारिश नहीं हो पाएगी ।तब काकाजी हमसे बोले “बेटा तुम्हारे मुंह से देशी मुर्गा और विदेशी शराब की गंध आ रही है जब पूरे होश में रहो तब राज नीति पर चर्चा किया करो हमसे ।” हमने कहा “काकाजी हम तो शासन की मान्यता प्राप्त आबकारी योजना का लाभ उठाकर ही राजनीतिक बातें कर रहे हैं जबकि आप वर्षों से यह अच्छी तरह जानते है कि इस देश की राजनीति और कुछ राज नेताओं के उत्थान और पतन में आबकारी नीतियों का बहुत बड़ा योगदान है ।देश मे जो भी मौसम निर्मित होता है
उसका केंद्रीय स्त्रोत तो शराब ही होता है काकाजी एक दल शराब बंदी करवाता है तो दूसरा उसका विरोध करता है ।एक सस्ती शराब बिकवाता है तो दूसरा मंहगी शराब बेचने आंदोलन करवाता है ।आखिर राजस्व आय के सबसे बड़े स्त्रोत को कौन बेवकूफ है जो ठुकरा दे? हमारी बात सुनकर काकाजी कुछ अनमने से होकर बोले “महात्मा गांधी जी तो किसी भी प्रकार के व्यसन के प्रबल विरोधी थे चाहे शराब हो तम्बाखू हो या बीड़ी ,सिगरेट हो ।” हमने कहा “इसी कारण तो उनके बहुत ज्यादा विरोधी हो गए क्योंकि सच कोई सुनना नहीं चाहता आज के जमाने मे ।आज कल तो बापू की प्रतिमा के निकट ही लायसेंस प्राप्त शराब दुकान खुल जाती है काका जी।”
हमारी बात सुनकर काकाजी को सच्चाई के समर्थन में हां में हां मिलाना ही पड़ा ।तब हमने कहा “काकाजी सावन का मौसम तो आजकल बहुत ही सक्रिय है एक से बढ़कर एक गठबंधन रूपी वृक्षारोपण हो रहे है ।कुछ तो छींटा कशी में कहते हैं कि “सांप और नेवले मिलकर सत्ता पर कब्जा करने की कोशिश में लगे हैं ।” हमारी बात सुनकर काकाजी बोले “बेटा अब हम तो हो गए 75 पार अब हमारे लिए बंद हो रहे हैं सरकार बनाने के द्वार ।सांप नेवले मिले या मोर और नाग मिलें हमको क्या लेना देना “।हमने कहा “काकाजी आखिर अनुभवी होना भी बहुत मायने रखता है ।आप अपने आप को कमजोर न समझें कुछ नहीं तो किसी राज्य का राज्यपाल का संवैधानिक पद तो आपको मिल ही जायेगा ।” हमारी बात सुनकर अजीब सी मुस्कुराहट बिखेरते हुए काकाजी बोले “बेटा बुढापे में राज भवन का बसंत हमारे लिए किसी काम का नहीं ।सिवाय फीता काटने, उदघाटन करने और बजट भाषण पढ़ने के अलावा कौन हमें मंत्रियों की तरह
करोड़ों के कार्य करवाने की “बहार ” देगा ।हमने कहा बात तो आप की सही है काकाजी किंतु जब तक मौजूद रहते हैं पापाजी तब तक कौन पूछता है कैसे हैं ,कहां हैं काकाजी ।”
तब काकाजी बोले “बेटा आजकल बहु का भी ध्यान रखा करो पांचवा मौसम चल रहा है जिसे चुनाव का मौसम कहते हैं ऐसे मौसम में बहु को ससुराल में ही रहने की सलाह दिया करो ।” तो हमने कहा “काकाजी
महिला समानता के अधिकार के कारण ,महिला सशक्तिकरण के प्रावधानों के कारण आजकल जो महिलाओं पर अनावश्यक दबाव , प्रभाव या भाव दिखायेगा उसके जीवन मे निश्चित रूप से तनाव आएगा इसलिए नारी का सम्मान और नारी के प्रति अपने कर्तव्यों का निदान करके हम सारे देश मे बसन्त के मौसम का आव्हान कर सकते हैं ।देखिए आज एक ही बहु ने अपने विवेक का परिचय देकर एक दल विशेष में प्रवेश कर
सारे मौसमों को आत्म अवलोकन करने मजबूर कर दिया है।हवाओं का रुख बदल दिया है ।कुछ दलों का तापमान बढ़ा दिया है और कुछ का गिरा दिया है ।ऐसे में हो सकता है चुनावी मौसम का पारा बढ़ेगा किंतु यह भी सुनिश्चित है कि आरोप प्रत्यारोप रूपी ठंड से राहत मिलेगी ।।”
तब काकाजी बोले “बड़े वाले यू.पी.वाले काकाजी तो कह रहे हैं कि इस चुनावी मौसम में “कैराना -मुजफ्फरनगर की गर्मी को शिमला बना दूँगा ।”
तब हमने कहा “काकाजी वे योगी काकाजी हैं अपनी योग विद्या से बहुत कुछ कर सकते हैं जी ।उनको गर्मी के मौसम को बरसात में बदलना आता है उन्हें बड़े बड़े बादलों से टकराना आता है ।जब उनकी बसन्त बहार में एक मौलाना जी की बहू ने इस चुनावी मौसम में उनके दल में शामिल होकर अपनी समस्या का हल ढूंढ लिया है तो आपको अनुमान लगा लेना चाहिए कि इस बार के चुनावी मौसम में गरज के साथ ओले बरसने की पूरी संभावना है जिससे गठबंधन रूपी फसलें बुरी तरह प्रभावित होगीं ।।फिर हो सकता है इस्तीफों की बहार
आए और बंधन ही छूट जावे तब सभी कहेंगे “पांच बरस का मौसम यार मौसम यार क्या पछताना हमको यार हमको यार ।।
प्रणय श्रीवास्तव “अश्क “