बचपन की कोई तस्वीर

बचपन की कोई तस्वीर नहीं है मेरे पास

अब जब पहले से ज्यादा बिगड गयी है सूरत

तो सोचता हूँ कैसा रहा होऊँगा मैं बचपन में?

और यह भी कि क्यों नहीं है 

बचपन  की कोई तस्वीर मेरे पास?

न घर में और न सरकारी पंजी में कहीं!

मुझे, भावुक ,परेशान

और उदास देखकर

 कहती है पिंकी, तस्वीर खिंचवाना 

पैसे वालों के बस में होता होगा उस समय

कोई मोबाइल तो था नहीं उस जमाने में।

लोग गाडी से शहर जाते होंगे

होटल, सिनेमा, फोटो का मतलब

सबके सब पैसे वाले जानते होंगे

या उनके बच्चे!

यह सही है

उस समय उन अमीरजादों के बच्चों को 

हम में से हर कोई बिगडा हुआ ‘बच्चा’ कहता

कुछ – कुछ आवारा भी!

हमें उनसे दूर रहने की हिदायत थी

घर तो घर,स्कूल में भी जब-तब

बच-बचाकर मास्टर भी यही कहते

बुरी संगत से बचो।

इसलिए,

नहीं केवल इसलिए नहीं,

यह कतई मुमकिन  नहीं था

शायद इसलिए

उनके शौक की नकल नहीं की हमने

हम अनजाने ही घृणा करते थे उनसे!

इस तरह दुख और अभाव में

उनसे ज्यादा खुद

अपने बचपन के सब शौक से।

यहाँ तक कि नाटक ,नौटंकी,

और उपन्यास से भी दूर ही रहे हम

अच्छे बच्चे बनने के भ्रम में।

पर आज सोचता हूँ, तो लगता है 

यह गरीबी का तंग पाठ था

जो गलत था सिरे से।

एक रून्धी हुई समझदारी

जिसे हमारी आँखों के आँसू से

नम किया गया था जबरन

मैं कितना भी हठ करूँ और रोऊँ

जानता हूँ महज मजबूरी 

और झूठी नैतिकता के नाम पर

खोये हुए मेरे बचपन के आत्म-अंश

अब कभी नहीं लौट सकते।

काश! मेरे पास  पैसे होते

बचपन की कोई तस्वीर होती!

संजय कुमार सिंह, प्रिंसिपल पूर्णिया महिला काॅलेज पूर्णिया-854301