सहमत न थे लोग उससे
करने लगे पत्थरों की बारिश
वहीं खड़ा रहा वह बचता बचाता
बाद में देखा लोगों ने
उसने घर बना लिया उन पत्थरों से
फिर एक बार लोग उससे असहमत थे
उसके तर्कों से नहीं पार पाते थे
हार जाते थे
अंधेरे में उसके घर में लगाकर आग चले गए
बाद में देखा लोगों ने
पत्थरों का घर वैसा ही खड़ा है बिना जले
अंदर उनकी आग को बनाकर दीपक
लगा हुआ है वह अपने काम में
चैन नहीं पड़ा लोगों को
तुले थे उसे खत्म करने पर
भरकर शर्बत में ज़हर रख आए
बाद में लोगों ने देखा
मर्तबान खाली था
पीकर ज़हर नीलकंठ बन
घर के पास पेड़ के नीचे
आसन लगाए बैठा वह
पूजा जा रहा था कई लोगों द्वारा
— डॉ टी महादेव राव
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