भूमि की सेज

श्वेद  साथ  ना  छोड़ता, बरस  रही  है  आग।

जल  बिन  मुरझाने लगे, हरी  दूब  के भाग।।

पंछी  खोजे  आसरा, मिले  जहाँ  फल  नीर।

शीतलता की छाँव पा, मिटे सकल जग पीर।।

नद , निर्झर, सूखन  लगे, सूखे  बाग , तड़ाग।

जल बिन धूधू कर जला,हलधर का भी भाग।।

दिनकर  के  आशीष  से,  मुस्काता  दिनमान।

रोम  रोम  व्याकुल  हुआ,गर्वित  है अभिमान।

धरा  धैर्य   से  ताकती , श्वेत   मेघ  का  रूप।

बादल  छाने  से   सदा , छँट  जाती  है   धूप।।

मानव ने निज स्वार्थ में ,सब को दिया बिसार।

देता  सब  का  ध्यान तो, रोता  नहिं  संसार।।

पात पात  मुरझा  गया, रवि  का सहकर तेज।

पुरवाई  सँग  लू  चली, तपी   भूमि  की  सेज।

बैठ   गए  जो   धूप  में,  तन  से    सूखे   रक्त।

काम  आवे  नहिं औषधि  हरि को भूले भक्त।।

नीर   बदलता  रूप  है,  सिन्धु   करे   विस्तार।

सीमा   रेखा  तोड़ के, चहुँदिशि   करे  प्रसार।।

सीमा मिश्रा, बिन्दकी,

 फतेहपुर,उत्तर प्रदेश