-पीएम पद ठुकरा कर सभी को कर दिया था अचंभित
नई दिल्ली । कांग्रेस अंतत: बुधवार को मल्लिकार्जुन खड़गे के रूप में पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष मिल ही गया है। खड़गे ने शशि थरूर को भारी अंतर से शिकस्त देकर पार्टी सुप्रीमो की कुर्सी हासिल की है। राहुल गांधी का कहना है कि पार्टी के नए अध्यक्ष उनकी भूमिका तय करेंगे। पार्टी में राजनीतिक परिवर्तन के बीच सोनिया गांधी का उल्लेख करना अनिवार्य है। वह सबसे लंबे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष रहने वाली नेता हैं। उन्होंने पार्टी की कमान उस वक्त थामी थी, जब कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष करने के साथ ही आंतरिक फूट से जूझ रही थी। उनके नेतृत्व कौशल का अंदाजा इसी बात से लगाई जा सकती है कि कांग्रेस की अगुआई वाला गठबंधन केंद्र में लगातार दो बार सरकार बनाने में सफल रहा।
वर्ष 2004 में कांग्रेस के तमाम दिग्गज नेताओं ने एक तरह से हथियार डाल दिए थे। अटल बिहारी वाजपेयी के फिर से सत्ता में आने की पूरी संभावना बन चुकी थी, लेकिन सोनिया गांधी के मन में कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने महज 6 साल पहले ही साल 1998 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया था। उन्होंने पार्टी के अनुभवी और दिग्गज नेताओं के उलट सोच रही थीं। उन्होंने विश्वस्त नेताओं के साथ बैठकों का दौर शुरू किया। लोकसभा चुनाव को लेकर रणनीति भी तय की गई। चुनाव प्रचार कैसे किया जाए, इसके लिए खास सत्र आयोजित किया गया। उनके ही प्रयासों का नतीजा है कि कांग्रेस की अगुआई में केंद्र में यूपीए की सरकार बनी। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज और जनप्रिय नेता के होने के बावजूद बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ा था।
साल 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की अगुआई में गठबंधन की जीत के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठने लगा कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा? पार्टी नेताओं के अलावा उन्होंने तब अस्वस्थ चल रहे हरकिशन सिंह सुरजीत से मुलाकात की। जब उन्होंने बताया कि वह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठेंगी तो दिग्गज वाम नेता भौंचक्के रह गए। उन्होंने मनमोहन सिंह का नाम आगे किया, जिसका किसी ने विरोध नहीं किया। सोनिया गांधी का कहना था कि उनके पीएम बनने से अनावश्यक बखेड़ा खड़ा हो सकता है।
बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को वर्ष 2002 में चुनौती मिली। जितिन प्रसाद ने भी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने का फैसला किया। जितिन प्रसाद को 94 मत आए थे, जबकि सोनिया गांधी को 7700 वोट मिले थे। इसके बावजूद सोनिया गांधी ने जितिन प्रसाद को पार्टी की सर्वोच्च संस्था कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शामिल किया था। इससे पहले उनके विदेशी मूल के होने का मुद्दा उठाते हुए शरद पवार, पी. संगमा और तारिक अनवर जैसे दिग्गज नेता ने पार्टी छोड़ दी थी। यह सोनिया गांधी के करिश्माई नेतृत्व का ही नतीजा था कि साल 2004 में केंद्र की सत्ता में कांग्रेस की वापसी हुई।