श्री गिरिराज वंदना

साहित्य

स्याम सरूपा  नील मनि,हुलसत   हिये  हिलोर।

दिव्य  सिला मुद मंगली,मन  नाचत  बनि मोर।।

चौंर    ढुरत   वृक्षावली,सीस  मुकुट   धरि  धौर।

दरस-परस   सेवत सकल, भक्त-संत ब्रज पौर।।

कृष्ण कांति कन-कन निरखि,हरखि करहिं श्रुति गान

धेनु    चरावत   ग्वाल  छवि,दरसत   सिद्ध सुजान।।

नमन  पुरंदर   मेघ  बनि,पूजें    अचल     विराट।

पवन पंख लै  उड़ि चली,ब्रज रज सजत ललाट।‌।

विकसत   सुमन तराइ बन,चरन सरन झरि जाँय।

कर्ता   कारन जगत पति, आपहिं  पुजैं   पुजांँय।।

पाद   पखारत  भानुजा,  जुग-जुग  बहीं  समीप। 

चन्द्र    उतारत    आरती,  सुकल  पक्ष धरि दीप।।

प्रभु  लीला  झाँकी  करत, बड़  भागी    हरिदास।

रस चाखत नित रसिक प्रिय,बाबा   ठाकुर दास।।

बंशी धर    गिरधर  बनत,आपहिं    उठहिं  उठाँय।

लीला   धर   लीला करत,ब्रज रज    रास रचाँय।।

जीव जगत  बहु रूप धरि,साधक  सरन   अनेक।

पादप  मानुस   बन्य पसु, ध्यान धरत  सब  एक।।

कुटी  अखाड़ौ  गिरि गुफा,जग-मग दिव्य प्रकास।

करें   पखाबज नाम धुनि,  रोम -रोम    उल्लास।।

                  देवी प्रसाद गौड़ 

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