मन!!!!!आकाशगंगा 

साहित्य

हृदय के भीतर 

न जाने कितने ब्रह्मांड बसते हैं।

विचार कभी ग्रह बनकर 

परिक्रमा करते हैं,

कभी टूटते तारों-से 

बिखर जाते हैं।

कुछ स्मृतियाँ चाँद की 

शीतलता बनकर ठहरती हैं,

तो कुछ इच्छाएँ

 सूर्य-सी दहकती रहती हैं।

और मन इन्हीं अनगिनत 

आकाशगंगाओं में भटकता है।

और जो शब्दों में उतर आता है,

 आपके पास चला आता  है। 

 आपके स्नेह और दुलार के लिए।

सविता सिंह मीरा 

जमशेदपुर