इन्दौर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय खंडपीठ इन्दौर में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत तीन व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इस आधार पर इन्कार कर दिया कि जांच में प्रथम दृष्टया उनकी संलिप्तता का पता चला है क्योंकि उन्होंने कथित रूप से धर्मांतरण के लिए प्रलोभन देने के विज्ञापन में इस्तेमाल होने वाले उपकरण उपलब्ध कराए थे।
धर्मांतरण और धर्मांतरण हेतु प्रलोभन के इस मामले में 20 जून, 2025 को गजराज सिंह ने पुलिस को दर्ज अपनी शिकायत में बताया था कि सुबह 9 बजे भग्गू जियाजी के घर पर एक बैठक बुलाई गई थी जिसमे गांव के कुछ व्यक्तियों ने ग्रामीणों को यह आश्वासन देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के लिए प्रेरित किया था कि ईसाई अनुयायियों को मुफ्त चिकित्सा उपचार, अच्छी शिक्षा और प्रत्येक अनुयायी को 50,000 रुपये की राशि प्रदान की जाएगी। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मंजू, किरण, जगराम, मिथुन और एक अन्य इस तरह पांच व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच कार्रवाई शुरू की तो एक अन्य आरोपी के नाबालिग होने की बात सामने आई जिसके बाद विवेचना कर प्रकरण चालान कोर्ट में पेश किया गया था। जहां आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए गए जिसकी खिलाफ उन्होंने उच्च न्यायालय का रूख किया। जिस पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 227 के दायरे का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा, संबंधित न्यायाधीश को केवल मामले के अभिलेख और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों पर ही विचार करना होता है। यदि ऐसे विचार-विमर्श के बाद न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि संबंधित अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने का पर्याप्त आधार नहीं है, तो कारण बताते हुए उसे बरी कर दिया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि शिकायत में आरोप लगाया गया था कि कुछ लोग ग्रामीणों को यह आश्वासन देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के लिए प्रेरित कर रहे थे कि ईसाई धर्म का पालन करने वाले व्यक्तियों को मुफ्त चिकित्सा उपचार, अच्छी शिक्षा और प्रत्येक को 50,000 रुपये की राशि प्रदान की जाएगी। कोर्ट ने पाया कि उपलब्ध साक्ष्य प्रथम दृष्टया अधिनियम की धारा 2(क) के अंतर्गत प्रलोभन को प्रकट करते हैं। अतः न्यायालय ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और आरोप तय करने के आदेश को बरकरार रखा।
युगल पीठ ने याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की कि – जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री से प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता राय सिंह की संलिप्तता का पता चलता है, क्योंकि उन पर धार्मिक धर्मांतरण के लिए प्रलोभन देने के विज्ञापन में इस्तेमाल किए गए उपकरण उपलब्ध कराने का आरोप है। आरोप तय करने के चरण में, न्यायालय को केवल यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, न कि किसी मुकदमे की तरह साक्ष्यों का मूल्यांकन करना। उक्त स्थापित सिद्धांत को लागू करते हुए, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है।

