तारों की सक्रियता से बना विशाल गैस का बुलबुला है गैलेक्टिक सेंटर लोब

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नई दिल्ली । पिछले चार दशकों से अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को आकाशगंगा में स्थित एक विशाल रहस्यमय ढांचा परेशान कर रहा था, जिसे गैलेक्टिक सेंटर लोब कहा जाता था। इस रहस्य को इतना गूढ़ माना जाता था कि एक टीम ने इसे ‘गैलेक्टिक एस्ट्रोफिजिक्स का रोर्शाख टेस्ट’ तक कह डाला था। हाल ही में जर्मनी की हीडलबर्ग यूनिवर्सिटी की एस्ट्रोफिजिसिस्ट कैथरीन क्रेकेल के नेतृत्व में एक नई रिसर्च ने इस 40 साल पुराने पहेली से पर्दा उठा दिया है। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि यह गैलेक्टिक सेंटर लोब वास्तव में गैलेक्सी के केंद्र में है ही नहीं। यह हमारी पृथ्वी के काफी करीब (लगभग 6,520 प्रकाश-वर्ष) स्थित एक बंद लूप है, न कि कोई विशाल खुला लोब। इसका मतलब है कि यह पहले सोचे गए आकार से काफी छोटा है। यह ढांचा किसी सुपरमैसिव ब्लैक होल के गुस्से का परिणाम नहीं, बल्कि तारों की सक्रियता से बना एक विशाल गैस का बुलबुला है। पुरानी रेडियो इमेजेस में यह एक खुले लोब जैसा इसलिए दिखता था, क्योंकि इसका निचला हिस्सा गैलेक्टिक प्लेन के पृष्ठभूमि में आसपास की रोशनी में मिल जाता था, जिससे इसकी पूरी बंद आकृति नजर नहीं आती थी।
कैथरीन क्रेकेल और उनकी टीम ने एसडीएसएस-वी लोकल वॉल्यूम मैपर सर्वे के डेटा का इस्तेमाल किया। इस सर्वे में मिल्की वे के भीतर चमकती गैस के विस्तृत नक्शे तैयार किए जाते हैं। उन्होंने विशेष रूप से आयोनाइज्ड सल्फर की लंबी वेवलेंथ वाली रोशनी का उपयोग किया, जो धूल को आसानी से पार कर जाती है। इससे उन्हें लूप के निचले हिस्से को भी देखने में मदद मिली, जो पहले छिपा हुआ था। वैज्ञानिकों ने इस बुलबुले की रोशनी को कम करने वाली धूल की मात्रा की तुलना मिल्की वे के विस्तृत थ्री-डायमेंशनल धूल मैप से की, जिससे उन्हें इसकी सटीक दूरी का अनुमान लगाने में सफलता मिली। यह बुलबुला मूल रूप से हाइड्रोजन गैस का एक विशाल बादल है जो तेज अल्ट्रावायलेट रेडिएशन के तहत लगातार चमक रहा है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पहले के विशाल तारों द्वारा बनाया गया होगा, जो उसी स्टेलर नर्सरी में पैदा हुए होंगे जहां ओरियन के बर्नार्ड्स लूप जैसे ऑब्जेक्ट बने थे। ऐसे विशाल तारे कम जीवन जीते हैं और सुपरनोवा विस्फोटों के साथ समाप्त होते हैं, जिससे बड़ी कैविटी बनती है और नए तारों के निर्माण की लहर शुरू होती है, जो फिर गैस को आयोनाइज करती है। टीम ने इस ढांचे का नया नाम ‘ग्रेटली कन्फ्यूज्ड लूप’ प्रस्तावित किया है। 115 प्रकाश-वर्ष के आकार वाला यह लूप ओरियन के बर्नार्ड्स लूप से छोटा है। यह खोज दर्शाती है कि हमारी आकाशगंगा धूल और गैस के घने बादलों से भरी होने के कारण अपने कई रहस्यों को कितनी खूबी से छिपा सकती है।