रात सपने में मेरे बुद्ध आए।
अंतःकरण में कब से दबे हुए
सवाल लगेकुलबुलाने…!!
लगी पूछने मैं उनसे ढेरों सवाल
रात में क्यों गए …?
प्रेम और समय लेकर भी तो
यशोधरा से
जाया जा सकता था …?
तो फिर अपने ही घर से,
वो भी आधी रात को दबे पाँव
चले जाना –
यह कितना उचित था …?
ऐसी औरतें समाज की नज़रों में
न तो सधवा रहती हैं,
न ही विधवा…
जिन्हें पता ही न हो कि
उनका जीवन साथी है कहाँ …?
बस साथ होते हैं- अंतहीन आँसू,
ईश्वर का सानिध्यऔर
एक अनकहा-सा इंतज़ार …
ताउम्र का इंतज़ार-
एक दिन उनके घर सकुशल
लौट आने का।
जवाब में बुद्ध ने सिर्फ इतना कहा-
“ कौन हो देवी …?
इतना सवाल तो यशोधरा ने भी नहीं किए। “
मन में आया कि कह दूँ-
“ तभी तो आज तक हर स्त्री
यशोधरा के हिस्से के सवाल
पूछ रही है …फिर भी … ”
जवाब में मैंने सिर्फ इतना कहा-
” बुद्ध बनकर भी क्या हासिल हुआ जब
एक औरत के मौन
और दर्द से भरी निगाहों में
अपने ही लिए उपजे ढेरों सवालों को
नहीं पढ़ पाए तुम …! ”
तो कैसे हुए बुद्ध दुनिया के लिए …?
बुद्ध और प्रबुद्ध होकर भी
रह गए यशोधरा की नज़रों
में …बुद्धू … !!
क्योंकि …
यशोधराएँ तो अपने लिए
अपने साथी की नज़रों में
सिर्फ प्रेम तलाशती हैं …
ज्ञान नहीं!!
● प्रतिभा विट्टन देवी श्रीवास्तव
नोएडा/ लखनऊ (उ.प्र.)

