मनुष्य को स्वाभिमान के साथ जीवन जीना चाहिए: पीएम मोदी

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पीएम मोदी ने एक्स पर दिया एकजुटता पर जोर
नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक प्रेरणादायी सुभाषित साझा किया, जिसमें आत्मसम्मान, साहस और स्वाभिमान के साथ जीवन जीने के महत्व पर बल दिया गया। उन्होंने संस्कृत का श्लोक, उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम्। अप्यपर्वणि भज्येत न नमत्वेव कस्यचित्॥ साझा किया। इस श्लोक का हिंदी अर्थ है कि मनुष्य को सदैव अपने आत्मसम्मान, साहस और स्वाभिमान के साथ जीवन जीना चाहिए। सच्चा पुरुषार्थ और पराक्रम इसी में है कि व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता न करे, बल्कि सत्य, धैर्य और आत्मगौरव के साथ अपने आदर्शों पर दृढ़ रहे। यह संदेश राष्ट्र निर्माण में नैतिक मूल्यों और व्यक्तिगत दृढ़ता की भूमिका को रेखांकित करता है।
इससे ठीक एक दिन पहले, सोमवार को भी प्रधानमंत्री ने सुभाषित के माध्यम से सामूहिक संकल्प और एकता की शक्ति का आह्वान किया था। उन्होंने लिखा था, सामूहिक संकल्प और एकता की शक्ति से ही देश आगे बढ़ता है। यही भावना भारत की प्रगति और समृद्धि की मजबूत नींव है। इसके साथ ही उन्होंने एक श्लोक, समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥ भी साझा किया था, जिसका हिंदी अर्थ है कि हम सबके संकल्प एक समान होने चाहिए, हमारे मन एकता के भाव से जुड़े होने चाहिए, जिससे हम सभी परस्पर सहयोग तथा समान व्यवहार के साथ समाज की उन्नति के लिए निरंतर प्रयास करते रहें। इन संदेशों के जरिए प्रधानमंत्री लगातार समाज में सकारात्मक सोच और सहभागिता को बढ़ावा दे रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर भी इसी तरह का प्रेरणादायी सुभाषित साझा किया था। तब उन्होंने उन सभी देशवासियों को हृदय से नमन किया था, जिन्होंने उस वीभत्स दौर से निकलकर देश की प्रगति में अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने अपने साहस और सामर्थ्य से दिखाया कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी संकल्पों को सिद्ध किया जाता है और सद्भावना तथा एकजुटता की राष्ट्रीय भावना को सशक्त करने का आग्रह किया था। इस अवसर पर साझा किया गया श्लोक था, उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥ जिसका हिंदी अर्थ है कि परिश्रम, उद्यम और पुरुषार्थ से ही विविध कलाएं, विज्ञान, तकनीकी कौशल, शिल्प तथा नवाचार विकसित होते हैं और सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह श्लोक मनुष्य को भाग्य के भरोसे न बैठकर साहस, कर्मठता और निरंतर प्रयास के साथ अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहने की प्रेरणा देता है, क्योंकि पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माता है। प्रधानमंत्री के ये सुभाषित सामाजिक सद्भाव, व्यक्तिगत उत्थान और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रहे हैं।