जम्मू । जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने उपराज्यपाल (एल-जी) द्वारा आरक्षण प्रस्ताव को मंज़ूरी देने में हो रही देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है और जेन-ज़ी प्रोटेस्ट जैसे विरोध प्रदर्शन की धमकी दी है। उनकी कैबिनेट ने 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव पारित कर दिया है, लेकिन उपराज्यपाल की मुहर का इंतज़ार है।
दरअसल, जम्मू-कश्मीर में आरक्षण नीति में कई बड़े बदलाव हुए हैं। 5 अगस्त 2019 को विशेष दर्जा खत्म होने से पहले, सरकारी नौकरियों में विभिन्न वर्गों के लिए 43 प्रतिशत सीटें आरक्षित थीं, जिनमें अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), नियंत्रण रेखा और अंतर्राष्ट्रीय सीमा के पास रहने वाले लोग, पिछड़े इलाकों के निवासी, दिव्यांगजन और पूर्व सैनिक शामिल थे।
लेकिन 2024 में, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने जम्मू-कश्मीर आरक्षण अधिनियम 2004 में संशोधन कर सरकारी नौकरियों में आरक्षण को 43प्रतिशत से बढ़ाकर 70प्रतिशत कर दिया। यह बढ़ोतरी पहाड़ी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिए जाने के कारण हुई थी, जिसका गुर्जर और बकरवाल समुदाय ने हमेशा विरोध किया। गुर्जरों को शांत करने के लिए प्रशासन ने एसटी कोटा 10 से बढ़ाकर 20प्रतिशत करने की घोषणा की। इस फैसले से वे समूह नाराज़ हो गए जो किसी भी आरक्षण के दायरे में नहीं आते थे, क्योंकि उनके लिए केवल 30प्रतिशत नौकरियां ही बची थीं। इस पृष्ठभूमि में, उमर अब्दुल्ला की सरकार ने आरक्षण को 50प्रतिशत तक सीमित करने की सिफारिश की। एक कैबिनेट सब-कमेटी ने अक्टूबर 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसे कैबिनेट ने मंज़ूरी दे दी और अगले ही महीने उपराज्यपाल आवास (लोक भवन) भेज दिया। हालांकि, उपराज्यपाल ने इस रिपोर्ट पर कुछ सवाल उठाए थे, जिनका जवाब सरकार ने दे दिया है, लेकिन उसके बाद से इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है। आरक्षण प्रस्ताव को मंज़ूरी न मिलने पर उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में कहा, उसके बाद क्या हुआ, कोई हमें बताए। क्या इसे मंज़ूरी मिल गई है? उम्मीद है कि ‘जेन-ज़ी’ वाला ट्रेंड यहां भी नहीं फैलेगा। इसके लिए हम ज़िम्मेदार नहीं होंगे। हमने अपना काम कर दिया है… यह अच्छी बात नहीं है कि वे हमारी कैबिनेट के प्रस्तावों को मंज़ूरी देने में देरी कर रहे हैं या उन्हें दबाए हुए हैं। उन्होंने प्रशासन पर कैबिनेट के प्रस्तावों को दबाने का आरोप लगाया। इस मुद्दे ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में भी उबाल ला दिया है, जहां नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) जैसे दलों ने आरक्षण को तर्कसंगत बनाने का वादा किया है। वहीं, बीजेपी ने अग्निवीरों और आरक्षित समूहों के कर्मचारियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण का वादा किया है। उमर अब्दुल्ला को अपनी ही पार्टी के भीतर और जनता से भी विरोध का सामना करना पड़ा है, खासकर तब जब विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों से पता चला कि कश्मीर के मुकाबले जम्मू में रिजर्वेशन कैटेगरी के ज़्यादा सर्टिफिकेट जारी किए गए थे। फिलहाल, सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर यह गतिरोध जारी है।

