-जेपीसी की बैठक में प्रियंका गांधी समेत विपक्षी नेता रहे मौजूद
-129वें संविधान संशोधन विधेयक पर मंथन जारी
-चौधरी बोले- अब तक जिनसे चर्चा हुई उनमें 99प्रतिशत स्टेकहोल्डर्स पक्ष में
नई दिल्ली । ‘एक देश-एक चुनाव’ यानी वन नेशन-वन इलेक्शन को लेकर राजनीतिक और संसदीय गतिविधियां तेज हो गई हैं। 129वें संविधान संशोधन विधेयक पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की सोमवार को अहम बैठक हुई। इसमें समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी के अलावा कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम, तृणमूल कांग्रेस की सांसद सागरिका घोष और एनसीपी (शरद पवार) की सांसद सुप्रिया सुले समेत कई सदस्य शामिल हुए।
बैठक के बाद जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी ने कहा कि समिति ने अब तक जिन स्टेकहोल्डर्स से चर्चा की है, उनमें से बड़ी संख्या एक साथ चुनाव के पक्ष में है। उन्होंने बताया कि पी. चिदंबरम ने बैठक में कांग्रेस का पक्ष रखा। वन नेशन-वन इलेक्शन को 2034 के बजाय 2029 में ही लागू किए जाने की संभावना को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। जेपीसी अध्यक्ष पीपी चौधरी के मुताबिक, अब तक समिति के सामने आए स्टेकहोल्डर्स में करीब 99 प्रतिशत ने एक साथ चुनाव के पक्ष में राय व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो इसे 2029 में लागू किया जा सकता है।
वन नेशन-वन इलेक्शन के समर्थकों का तर्क है कि देश में बार-बार चुनाव होने से प्रशासनिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता है और विकास कार्य प्रभावित होते हैं। चुनावी ड्यूटी में सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों की तैनाती से नियमित प्रशासनिक और शैक्षणिक गतिविधियां भी प्रभावित होने की बात कही जाती है। समर्थकों के अनुसार एक साथ चुनाव होने से चुनावी खर्च में कमी आ सकती है, प्रशासनिक कार्यक्षमता बढ़ सकती है और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आ सकती है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी सोमवार को बार-बार होने वाले चुनावों को विकास में बाधा बताया है।
विपक्ष के सवाल- सरकार गिरने पर क्या होगा?
विपक्ष ने उठाए संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल
विपक्षी दलों का कहना है कि एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था में कई संवैधानिक और व्यावहारिक सवाल खड़े होंगे। उनका प्रमुख सवाल है कि यदि किसी राज्य या केंद्र की सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले गिर जाती है तो क्या होगा? विपक्ष यह भी पूछ रहा है कि ऐसी स्थिति में अगले चुनाव तक राष्ट्रपति शासन लगाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल होगा या नहीं। इसके अलावा किसी राज्य में सरकार गिरने पर केवल शेष अवधि के लिए चुनाव कराना और फिर उसे राष्ट्रीय चुनाव चक्र के साथ जोड़ना भी चुनौतीपूर्ण होगा। ऐसे में यदि 2029 में लोकसभा के साथ सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव कराने की व्यवस्था लागू होती है तो कई राज्यों के मौजूदा कार्यकाल में बदलाव करना पड़ेगा।
इन राज्यों के कार्यकाल का क्या होगा?
साल 2028 में चुनाव होने वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों में 2029 में चुनाव कराने के लिए विधानसभा का कार्यकाल समय से पहले समाप्त करना पड़ेगा। इसी तरह 2027 में चुनाव होने वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात, मणिपुर, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में भी 2029 में चुनाव कराने के लिए मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल कम करना होगा। 2026 में चुनाव हुए तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में भी 2029 में चुनाव कराने पर करीब दो साल पहले विधानसभा चुनाव कराने पड़ेंगे। दिल्ली और बिहार में 2025 में हुए चुनावों के कारण वहां की विधानसभाओं का कार्यकाल 2030 तक है, इसलिए 2029 में चुनाव कराने पर उनका कार्यकाल करीब एक साल कम करना होगा। वहीं महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में 2029 के आसपास लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव होने हैं। आंध्र प्रदेश, ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश में भी लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव होते हैं, इसलिए इन राज्यों को एक साथ चुनाव की व्यवस्था में अपेक्षाकृत कम समायोजन की जरूरत होगी।
अभी लंबी है कानूनी और सियासी प्रक्रिया
हालांकि, प्रस्ताव को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन सहित कई कानूनी और राजनीतिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। विपक्षी दल लगातार इस व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं और इसके संभावित संवैधानिक एवं व्यावहारिक प्रभावों पर सवाल उठा रहे हैं।
पहले भी साथ होते थे लोकसभा-विधानसभा चुनाव
भारत में आजादी के शुरुआती दशकों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे। 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा चुनावों के साथ राज्यों में भी विधानसभा चुनाव हुए थे। 1967 के बाद कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग होने और राष्ट्रपति शासन लागू होने से चुनाव चक्र अलग होने लगा। 1972 में आम चुनाव समय से पहले कराए जाने के बाद एक साथ चुनाव का चक्र पूरी तरह टूट गया।

