इंदौर पुलिस को साधुवाद… की नजीर कार्रवाई – रीलबाजों – के लिए, जीते जी नरक है, मोबाइल की ज़ब्ती

इंदौर

इन्दौर पुलिस ने चोराहे पर लोट लगाते बेहूदा तरीके से विडियो बनाने वाली एक युवती के खिलाफ एफआईआर के साथ उसके मोबाइल जब्ती की नजीर कार्रवाई की है। निश्चित रूप से इस अनूठी और साहसिक कारवाई के लिए फिलहाल तो इन्दौर पुलिस साधुवाद की पात्र है।….. क्योंकि आज शायद छोटी सी प्रतीत हो रही इस कार्रवाई का इंपेक्ट बहुत बड़ा होगा और… यह कार्रवाई भविष्य के कई संभावित अपराधों तथा दुर्घटनाओं को रोकने का सबब भी बनेगी।
चंद सेकंड की सस्ती लोकप्रियता और सोशल साइट्स पर व्यूज की भूख में मर्यादा, दिमाग और कानून की धज्जियां उड़ाने की लगातार बढ़ रही घटनाओं के बीच शहर में हुई ऐसी ही एक ताजा घटना में तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स युवती के खिलाफ इंदौर पुलिस ने इस बार जो कदम उठाया है, वह न केवल काबिले-तारीफ है,…. बल्कि देश भर की पुलिस के लिए एक नजीर बन गया है।…. इन्दौर पुलिस ने शहर के व्यस्त लैंटर्न चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल रेड होने के दौरान जेब्रा क्रॉसिंग पर लोट लगाते हुए रील बना इन्दौर को शर्मसार करने वाली इस बददिमाग युवती पर सिर्फ कागजी एफआईआर ही दर्ज नहीं की है, बल्कि उसका मोबाइल भी ज़ब्त कर लिया।….. जो कि अपने आप में साहसिक और लीक से हटकर की गई नजीर कार्रवाई है। साधुवाद!
आज के इस डिजिटल युग में, जहाँ इस तरह के बददिमाग युवाओं की पूरी आत्मा, इज्जत और कायनात उनके स्मार्टफोन में सिमटी है, वहाँ मोबाइल की ज़ब्ती इन बददिमाग और लापरवाह लोगों के लिए जीते-जी नरक भोगने जैसी सबसे बड़ी सजा है।

पुराना लचर रवैया – माफ़ीनामे की नीति ने ही बिगाड़ा है इनका मिजाज

इस बददिमाग युवती की यह ताजा हिमाकत अचानक पैदा नहीं हुई है, बल्कि यह पूर्व के ऐसे ही मामलों में पुलिस और प्रशासन के पुराने लचर रवैये और माफ़ीनामे वाली संस्कृति का सीधा दुष्परिणाम है। शायद इंदौर पुलिस भूल गई हो, लेकिन जनता को अच्छी तरह याद है –

  • रसोमा चौराहे का वह तमाशा – इसके पहले श्रेया कालरा नाम की एक लड़की ने रसोमा चौराहे के व्यस्त सिग्नल पर रेड लाइट होते ही जेब्रा क्रॉसिंग पर नाचना शुरू कर दिया था। तब भी पुलिस ने केस तो बनाया, लेकिन अंततः महज एक औपचारिक माफी और ढीली कानूनी औपचारिकता के बाद मामला रफा-दफा हो गया।
  • छप्पन दुकान पर अश्लीलता – इसके बाद इंदौर के सुप्रसिद्ध और सांस्कृतिक पहचान वाले छप्पन दुकान क्षेत्र में एक लड़की के बेहद कम और अमर्यादित कपड़े पहन तकरीबन जन्मजात अवस्था में पब्लिक रिएक्शन रील बनाने का वीडियो वायरल हुआ। उस घटना से शहर की संस्कृति और अस्मिता पर गहरा आघात लगा था और इन्दौर को शर्मसार होना पड़ा था, लेकिन वहां भी पुलिस ने केवल एक साधारण माफीनामे और सोशल मीडिया पर खेद जताने के बाद उसे आसानी से छोड़ दिया था।

जनता का यह साफ मानना है कि यदि रसोमा चौराहे और छप्पन दुकान की उन घटनाओं और ऐसे ही अन्य मामलों के समय ही पुलिस ने ऐसी सख्त और अनूठी कार्रवाई की होती, तो शहर में रील बनाने की बढ़ रही इस कुसंस्कृति पर रोक तो लगती ही और फिर इन्दौर को शर्मसार करने वाली इस घटना की नौबत ही नहीं आती। जब अपराधियों को पता होता है कि वे कैमरे के सामने हाथ जोड़कर सॉरी बोलेंगे और कानून उन्हें छोड़ देगा, तो कानून का डर खत्म होना लाजिमी है।

रील्स की अंधी दौड़ – सड़कें तुम्हारी जागीर और तमाशे का अखाड़ा नहीं!

आज सोशल साइट्स पर रातों-रात वायरल होने की अंधी दौड़ ने युवाओं की तार्किक क्षमता को पूरी तरह सुन्न कर दिया है। जो जेब्रा क्रॉसिंग पैदल चलने वालों की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी, उसे इन रील्स-बाज़ों ने अपना बेडरूम समझ लिया है। यही नहीं कभी तेज़ रफ्तार कार या बाइक पर स्टंट करना, कभी चलती ट्रेन के गेट पर लटकना, तो कभी व्यस्त चौराहों पर ट्रैफिक रोककर ठुमके लगाना—यह लापरवाही अब एक संक्रामक मानसिक बीमारी बन चुकी है इसका इलाज बहुत ही जरूरी है।
इन तथाकथित इन्फ्लुएंसर्स का यह सोचना कि सड़क उनकी जागीर है और जनता उनके तमाशे की दर्शक, उनके खोखलेपन को दर्शाता है। ऐसी हरकतें न केवल गंभीर सड़क दुर्घटनाओं को न्योता देती हैं, बल्कि आपातकालीन वाहनों और आपात स्थिति में जाने वाले का रास्ता रोककर दूसरों की जान भी जोखिम में डालती हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि सिर्फ दिखावे के लाखों फॉलोअर्स वाले इन इंटरनेट के असंस्कारी वीरों को देखकर कम उम्र के बच्चे भी इसे कूल समझकर अपनी जान दांव पर लगाने लगते हैं।

परवरिश भी कटघरे में – लापरवाही की पहली छूट घर से ही मिलती है

इस पूरे तमाशे में जितना दोष इन बददिमाग रील्स-बाज़ों का है, उतना ही बड़ा दोष उनके माता-पिता (Parents) का भी है, जिन्हें भी इस सामाजिक पतन के लिए कठघरे में खड़ा करना बेहद जरूरी है। आज कई अभिभावक अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ चुके हैं, उनके द्वारा शुरुआती संस्कार और नैतिक मूल्यों की बलि देकर बच्चों के हाथों में बिना सोचे-समझे महंगे स्मार्टफोन और गाड़ियाँ थमा देना कहाँ की समझदारी है?
जब बच्चे चंद लाइक्स के लिए आधी रात को सड़कों पर हुड़दंग मचाते हैं या चौराहे पर इस तरह की अजीबोगरीब बेहूदा हरकतें करते हैं, तब माता-पिता की आँखें क्यों बंद रहती हैं? क्या वे अपनी संतानों की इन हरकतों से बेखबर होते हैं, या फिर वे यह सोचते हैं कि उनका बच्चा तथाकथित इंटरनेट सेलिब्रिटी बन रहा है? उनकी यह खोखली सोच और घर से मिलने वाली यही अंधाधुंध छूट और शह, बच्चों को कानून से भी बेखौफ बनाती है। जब तक माता-पिता अपने बच्चों की इंटरनेट गतिविधियों पर नजर नहीं रखेंगे और उन्हें सही-गलत का फर्क नहीं सिखाएंगे, तब तक सड़कों पर ऐसा मानसिक दिवालियापन नाचता रहेगा।

टेक दिग्गज और एल्गोरिदम – अराजकता बेचकर नोट छापने वाली दुकानें

इस सामाजिक पतन को बढ़ावा देने में इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसी टेक कंपनियां भी बराबर की दोषी हैं। इन प्लेटफॉर्म्स का एल्गोरिदम इस तरह से डिज़ाइन किया गया है जो ऐसी सनसनीखेज, नियम तोड़ने वाली, अश्लील और जानलेवा वीडियो को सबसे ज्यादा रीच (Reach) और व्यूज देता है। उनका यह सीधा गणित है—जितना बड़ा हुड़दंग, उतना बड़ा व्यूज और उतनी ही कमाई! उनका सिस्टम ह्यूमेन कंट्रोलिंग नहीं कम्प्यूटराईज्ड है, जिसे यह पता ही नहीं होता किसने देखा, किसने कमेंट किया, सिर्फ गिनती होती हैं… चाहे कमेंट में सलाह, सराहना या अपशब्द… लिखें गये हो। और यही व्यूज कमेंट की गिनती इन बददिमागों की दीवानगी है। इसलिए इन टेक जायंट्स को भी कठघरे में खड़ा करना अब बेहद ज़रूरी हो गया है।… जब तक ये कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसी रील्स को अपलोड होते ही ब्लॉक करने का सख्त सिस्टम नहीं बनाएंगी और इन पर भारी जुर्माना नहीं लगेगा, तब तक समाज में यह नंगा नाच बंद नहीं होगा।

सजा के साथ सख्त काउंसलिंग भी जरूरी –

सिर्फ कानूनी धाराओं से इस मानसिक विकृति का इलाज संभव नहीं है। पुलिस प्रशासन को ऐसे बददिमाग रील्स-बाजों (और जरूरत पड़ने पर उनके माता-पिता) के लिए अनिवार्य मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग सेशन आयोजित करने चाहिए। इन्हें हवालात की हवा के साथ-साथ यह भी समझाना जरूरी है कि वर्चुअल दुनिया के फेक लाइक्स और कमेंट्स से असल जिंदगी नहीं चलती। इन्हें यह अहसास कराना होगा कि चंद सेकंड के वीडियो के लिए अपनी या दूसरों की जान दांव पर लगाना क्रिएटिविटी नहीं, बल्कि गंभीर मानसिक दिवालियापन है।

मीडिया को निभानी होगी गंभीर भूमिका, कसनी होगी लगाम –

ऐसी घटनाओं पर मीडिया को भी गंभीर होना होगा, खासकर ये व्हाट्सएप इंस्टाग्राम जैसे सोशल साइट्स पर अति सक्रिय तथाकथित पत्रकारों पर ऐसे मामलों में कथित पत्रकारों द्वारा लगाम लगानी होगी। सोशल साइट्स के ये अति सक्रिय फारवर्डिए ऐसे मामलों को धड़ाधड़ आंख बंद करके फारवर्ड करना शुरू कर देते हैं, और कई तों इन बददिमाग रीलबाजों के सोशल अकाउंट के स्क्रीन शाॅट और लिंक भी फारवर्ड करते हैं तथा अपनी इस हरकत के कारण ये पत्रकार नहीं व्यूज मामले में उनके अप्रत्यक्ष रूप से मददगार बन जाते हैं…. और यहीं तो वे चाहते हैं। लेकिन फिर जब सामाजिक विरोध या कानून का डंडा इन रील बाजों पर चलता है तो वे इसका ठीकरा पत्रकारों (मीडिया) के सर पर फोड़ते हैं उनके ही मुंह पर उनको ही उनकी औकात दिखा कहने लगते हैं कि मीडिया ने गलत प्रोड्यूस किया….और उनके इस बयान को भी ये अति सक्रिय पत्रकार फिर फारवर्ड करना शुरू कर देते हैं।…. अतः पत्रकारों को भी ऐसे मामलों में स्व आचार संहिता बना अप्रत्यक्ष रूप से इन्हें सहयोग कर बढ़ावा नहीं देना चाहिए।

इंदौर पुलिस को चेतावनी – यह सिंघम गिरी सिर्फ हेडलाइन बनने तक न रहे, बल्कि नजीर बने !

इंदौर पुलिस ने एफआईआर और मोबाइल ज़ब्ती का जो हंटर चलाया वह शानदार और जानदार है, उसने इन तथाकथित रीलबाज़ों के हौसलों को एक बारगी पस्त तो किया है, लेकिन पुलिस प्रशासन के लिए यह एक बड़ी और तीखी चेतावनी तथा चुनौती भी बन गया है। अक्सर देखा गया है कि ऐसी कार्रवाइयां शुरुआती मीडिया हाइप, अखबारों की सुर्खियां और सोशल साइट्स पर वाह-वाही बटोरने तक ही सीमित रह जाती हैं। कुछ दिनों बाद मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं, पुलिस की पैरवी कमजोर हो जाती है, किसी नेता या रसूखदार के एक फोन कॉल पर या कानूनी कमियों का फायदा उठाकर ज़ब्त मोबाइल वापस सौंप दिए जाते हैं। नतीजा? ये बददिमाग फिर से उसी सड़क पर दोगुनी रफ़्तार से हुड़दंग मचाने लौट आते हैं।

इंदौर पुलिस को यह साफ समझना होगा कि यदि उसने अपनी इस अनूठी और सराहनीय कार्रवाई को अंजाम तक नहीं पहुंचाया — यानी अदालत में पुख्ता चार्जशीट दाखिल कर आरोपियों को कड़ी सजा और भारी जुर्माना नहीं दिलवाया —तो यह भी इन रील बाजों की तरह का ही सिर्फ एक सस्ता पब्लिसिटी स्टंट बनकर रह जाएगा। अगर पुलिस यहाँ ढीली पड़ी और फिर से माफ़ी के नाम पर ढील दी, तो इन बददिमाग हुड़दंगियों का हौसला दुगना हो जाएगा। प्रशासन को चाहिए कि इस कार्रवाई की कड़ाई और निरंतरता को अंत तक बरकरार रखे, ताकि भविष्य में कोई भी तथाकथित इन्फ्लुएंसर सड़क पर उतरकर तमाशा करने से पहले सौ बार कांपे। इसके लिए पुलिस को इन्हें सामाजिक अपराधी मान कदम उठाने आवश्यक है जो इस तरह के भी हो सकते हैं –
डोजर भरवाना – शहर में अपने आप को इन्फ्लुजर कहते ऐसी रीलें बनाने वालों को पहचान पुलिस नोटिस दे बुला उनके नाम पते दर्ज कर उनसे डोजर भरवाएं ताकि भविष्य में वे ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचे।
सोशल अकाउंट ही डिलीट करवा दे- यदि डोजर भरने के बाद भी किसी बददिमाग तथाकथित रील बाज द्वारा ऐसी लापरवाही पूर्ण गैर जिम्मेदाराना हरकत करने की हिमाकत की जाएं तो उसका सोशल अकाउंट पहले एक माह के लिए फिर भी नहीं सुधरने पर परमानेंट ब्लाक या डिलीट करवा दे।
तो इन्दौर पुलिस … फिलहाल तो आपकी यह नजीर शुरुआत बेहद बेहतरीन और तारीफें काबिल है, बस इसे इसके मुकाम तक पहुंचाकर एक कड़ा उदाहरण पेश कीजिए, वरना जनता इसे भी महज़ एक रील स्टंट ही समझेगी! और ये तथाकथित अपनी इसी तरह की हरकत को अंजाम देने फिर रोड़ पर उतर आएंगे।