हम किसी के मोहताज नहीं हैं

रखे रहो अपना मंच, माला, माइक

रखे रहो अपनी मचान

रखे रहो अपना छल ज्ञान 

रखे रहो अपना धर्मग्रंथ पुराण।

है हमारे पास हमारी भाषा

है हमारे पास हमारा नृत्य

है हमारे पास हमारा गान

है हमारे पास बहुजन पहचान।

खुद हैं जो नकलची और बनते ज्ञानी

पर हमारे ज्ञान की नहीं है कोई सानी

क्या चित्रकारी, क्या लोकगान क्या किसानी

दुनिया ने हमारी हैसियत मानी।

मेरे हंसो ! क्यों चाहते हो दरबे  में जाना

मुर्गों का  साथ निभाना

जो खुद उड़ नहीं सकते 

तुम्हें क्यों है उड़ने की  कला भूल जाना।

यह लोकतंत्र है दोस्तों 

अब किसी के सिर पर ताज नहीं है

खुद बनाएंगे अपना अवसर 

हम किसी के मोहताज नहीं हैं।

— संतोष पटेल

नई दिल्ली