प्रकाशनार्थ कविता

अनुभव

प्रेम की भाषा जुबान नही

ये तो वो अहसास है 

जो सिर्फ 

महसूस किया जा सकता है।

प्रेम की न कोई भाषा है और 

न कोई परिभाषा 

प्रेम को सिखाया नही जा सकता  

प्रेम को प्रशिक्षण 

नही दिया जा सकता  

यह तो आत्यन्तिक घटना है, 

जो अंतरमन के 

गहन तलों मे घटती है ।

आत्मा से आती है 

यह व्यक्ति के स्वभाव में 

उसके होने से स्वत: घटती है

यह अनायास घटना है

सायास नही।

इसे शब्दों में  

व्यक्त नही किया जा सकता  

मात्र अनुभव किया जा सकता है  

यह ऐसा ही है

जैसे किसी अंधे को 

कोई तस्वीर सौंपकर

उसके बारे में पुछो तो 

वो अपने अंदाज में  

उसके बारे में बताएगा 

जैसे कोई परी है

वैसे ही किसी गूँगे को 

गुड़ खिलाकर पूछा जाये कि 

इसका स्वाद क्या है 

गूँगा बता न सकेगा

प्रेम गूँगे का गुड़ है

प्रेम को जीया जा सकता है  

स्वयं जी कर ही जाना जा सकता है 

कि प्रेम क्या है

कि इसका अनुभव कैसा है

कि इसका  अहसास कैसा है

कोई दूसरा नही बता सकता 

बस स्वयं ही 

अनुभव किया जा सकता है

अच्छे लोगों का स्वभाव गिनती के 

शून्य की तरह होता है

लोगों की नजर में भले ही उसका  

मूल्य कुछ भी नहीं होता

लेकिन वो जिनके साथ होते हैं

उनकी  कीमत बढ़ा देते हैं !!  

● प्रतिमा पंकज तोड़ी,  

शाहदरा, दिल्ली – 32