पिता के लिए बेटी क्या होती है, कभी ये खुद पिता भी ना जान पाये
पिता का महत्व भी बेटी ससुराल जाकर ही जान पाये
खुशियों की चाभी है पिता, और गम पर ताला है
कितने नाज़ों से उसने बिटिया को पाला है
हर ख़्वाहिश पूरी हो जाती है, बिन बोले ही जिस दर पर
भगवान से भी ज्यादा महान है पिता
खुद की जरूरतें एक तरफ करके मेरे सपनों को मान दिया
कर सकूँ हर सपना पूरा इतना खुला आसमान दिया
उड़ना सिखाया हँसना सिखाया,
जीवन पथ पर चलना सिखाया
संग मेरे बच्चे बनकर अच्छे बुरे का भान कराया
जिन्होंने नींद में भी माँगी बस बिटिया के लिए दुआ
सदा साथ खड़े रहे चाहे जो भी हुआ
कभी भी छोड़ा अकेला ,सदा आसपास लगाए रखा खुशियों का मेला
जब भी रूठी मनाया मुझे, कभी ना की मेरी अवहेलना
प्यार और सम्मान दिया
त्याग और बलिदान किया
किसी की ना परवाह की पूरा हर अरमान किया
सोचो कितना दुख होता होगा उसे अपनी प्यारी कली को यूँ मुरझाते देख
कुछ जल्लादों को उसके अरमान तोड़ते देख
ससुराल अच्छा हो या बुरा पर पिता की कमी हमेशा खलती है
और पिता की जान भी तो कितना मचलती है
काश बेटियों की बिदाई का रिवाज़ ना होता
कोई पिताअपनी बेटी से कभी दूर ना होता
(गरिमा शर्मा”गीतांजलि”)