वह एक बार फिर टाका कमाने घर से निकला था । घर में कई दिनों से फाका पड़ा हुआ था ।सतू पी पीकर,आज कल आज कल कर रहा था।
लोकल सेल डिपो में, पीपल पेड़ के नीचे वह बिल्कुल अकेला और अलग-थलग बैठा हुआ था ।कंधे पर लाल रंग का एक पुराना गमछा डाल रखा था उसने । चेहरे पर थकान के चिन्ह साफ नजर आ रहे थे । थकान मीलों पैदल चलकर आने का नहीं था । थकान खेत-खलिहान में खटने का भी नहीं था । थकान था उस दौड़ का जो पिछले कई सालों से जय गुरुदेव के नाम पर दौड़ रहा था । आज उसकी शक्ल उन जुआरियों की तरह हो आई थी जो जिंदगी के जुए में अपना सब कुछ हार गया हो ।
यह लोकल सेल अगल बगल के दर्जनों गांवों के बेकार-बेरोजगार युवाओं के जीविका का मुख्य स्रोत का आखडा था । खेती-बारी से निकल कर लोग लोकल सेल में काम पाने के जुगाड भिड़ाते रहते थे। यहां लोकल सेल के किसी दंगल में काम मिल जाना, सी सीएल में नौकरी मिल जाने जैसी फिलिंग्स चेहरे पर आ जाती थी ।
कभी मर -मेहमानी में जाने पर कोई पूछ बैठता कि आज कल काम क्या चल रहा है तो छूटते जवाब देता ” तारापुरकोलियरी में काम करता हूं !”
” क्या सीसीएल में…?”
” लोकल सेल में !” वह मुस्कुराते हुए कहता था ।
उस दिन मुझे आफिस पहुंचने में काफी देर हो चुकी थी । मैं गुस्साता-भुनभुनाता चला आ रहा था। गांव के पड़ोसी लड़के ने सगे माता पिता को यह कहते घर से निकाल दिया था” हम अब तुम्हें खिला-पिला नहीं सकते हैं, अपना देख लो..!” और घर का दरवाजा अन्दर से बंद कर लिया था ।
यह कैसा युग आ गया है जहां सारे रिश्ते-नाते स्वार्थ के कंधे पर टिका हुआ है । अपनी छोटी छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी मां बाप को बेटे- बहुओं के कंधे को सहलाना पड़ता है, नहीं करने पर घर से निकल जाने की फरमान सुना दिया जाता है। लगता है पुनः हम जंगल युग में लौट चलें है-अच्छा है । सबका बारी आयेगा । यही सोचता आफिसगेट तक पहुंचा था कि पीछे से आती आवाज ने रूकने पर हमें मजबूर कर दिया
” काकुरूकना जरा ….!” यह भूलता सा संबोधन सुनकर अच्छा लगा था मुझे । तभी नजर नारायण पर पड़ी तो एक बारगी से चौंक पड़ा था…!”
लोकल सेल मजदूरों के बीच से वह उठा और मेरी तरफ बढ़ा । मैं कुछ सोचते हुए खड़ा हो गया था। घड़ी इस भाव से मैंने देखी कि मुझे देर हो रही है । परन्तु नारायण धीरे धीरे बढ़ा चला आ रहा था । लगा चाल से ही नहीं मन से भी काफी थका हुआ था ।
नजदीक आया तो जल्दी से पूछा” क्या बात है ? यहां कैसे ? यह उसी तरह का पूछना था जैसे आज ही उसे देख रहा था-” दुकान तो ठीक ठाक चल रही है न ? ” आगे जोड़ा था । इस पर भी उसने कोई जवाब नहीं दिया और बीमार नजरों से देखता रहा। अब मुझे उसकी चुप्पी अखरने लगी थी ।
लगा कि वह कुछ कहने से हिचक रहा है । कहीं कुछ गडबड है । इससे पहले कि मैं फिर कुछ बोलूं उसने मुंह खोला था-” काकू मुझे मालूम है नेता जी से आपकी खूब पटती है । एक कष्ट देना चाहता हूं । मैं लोकल सेल में काम करना चाहता हूं । नेता जी से बोलकर किसी दंगल में रखवा देते….!”
लोकल सेल मजदूरों के बीच बैठने की बात अब मुझे समझ में आ गई थी । लेकिन दुकानदारी छोड़ लोकल सेल मजदूर बनने की नौबत आई कैसे ? इसे समझने के लिए हमें भलमारा जाना होगा । अरे आप नहीं ! मैं जाऊंगा ।
तो जानकारी थी । नारायण भलमारा में एक पक्के दुकानदार के रूप में जम गया है । बिक्री-बट्टा भी अच्छी हो रही थी ऐसी खबर थी । महीना दस से पंद्रह हजार तक उठा लेता है । ऐसा जानकारों का कहना था । कई बार खुद देखा है, दुकान में खरीदारों की भीड़ को और सुनी थी एक पक्के साहूकार की तरह उसकी बात भी-” पहले की उधारी चुकता करो फिर सामान की बात करो । बकाया रहते फिर बाकाया नहीं चलेगा !”
उसी नारायण का आज लोकल सेल में काम करने वाली बात ने मुझे बुरी तरह झकझोर दिया था और मैं विश्वास नहीं कर पा रहा था कि सामने जिसे देख रहा हूं वह नारायण ही है और जो वह कह रहा है – सही है । चकित खड़ा कभी उसे तो कभी घड़ी की तरफ देखता । तभी उसने कहा-” अभी आप जाइए,शाम को घर में मिलता हूं । वहीं सारी बातें बताऊंगा आपको ..!”
मैंने उसे एक बार फिर इस भाव से देखा था और यकिन कर लेना चाहता था कि सामने वाला नारायण ही है ! अपने गांव का वही नारायण जो बचपन में अपना सिंघनअक्सर अपने पैंट में पोंछ लिया करता था ।
आफिस में उस दिन किसी काम में मेरा मन नहीं लगा । बार बार नारायण आंखों के सामने आकर खड़ा हो जाता था । आखिर चार पांच सालों में ऐसा क्या हो गया जो चलती दुकानी छोड़ नारायण को लोकल सेल में काम करने आना पड़ गया था । कभी मैं नारायण के बारे सोचने लगता तो कभी उसकी वर्तमान हालात पर चिंतित हो उठता ।
नारायण को मैं बचपन से जानता हूं । नाक से ठेनाचिपड कर चूतड में पोंछ लेने से लेकर स्कूल में पीछे की बेंच पर छिपकर बैठना और बैठे बैठे उसके ऊंघने तक की बातें मुझे याद आने लगी थी । गांव में उसका घर मेरे घर से कुछ ही दूरी पर था । वह मुझसे पांच साल छोटा था यानी पैंतीस चल रहा था । पर आज अचानक उसकी उम्र मेरी उम्र से पांच साल बड़ी लगी थी मुझे ।
किसान पिता के पांचवें पुत्र नारायण ने जब फूफा घर भलमारा में जाकर दुकान चलाने का जिम्मा थामा तब उसकी शादी हो चुकी थी । दहेज में मिले पचास हजार को दुकान में लगा दिया था उसने । रूपये हाथ में न आ पाने से बाप का मुख मलिन हो गया था लेकिन गांव वालों को लगा था एक बेकार लड़के ने बुद्धिमानी का काम किया है । साक्षर पत्नी शकुंतला से भी नारायण को काफी मदद मिलेगी ऐसा बहुतों का मानना था ।
शादी के कुछ ही दिनों बाद नारायण ने पत्नी को भी अपने पास बुला लिया था ताकि उसके बाहर जाने पर दुकान बंद न करनी पड़े ।
भलमारा से चार किलोमीटर दूरी पर चार कोयले की खाने थीं जहां सैकड़ों मजदूर काम करते थे और शाम को नारायण की दुकान से सामान लेने आते थे । उन्ही में सहदेव ठाकुर भी एक था । वह नारायण की दुकान से नारियल अगरबत्ती भी लेता था और जमुनिया नदी के किनारे बने शिव मंदिर में साप्ताह में एक बार पूजा करने जाता था । नारायण से दोस्ती हुई तो वह उसके घर में भी आना जाने लगा था । जात में नौवा और पक्षी में कौवा -कभी दोस्ती में खरे उतरे हों -काल कथा में नहीं मिलता है । इसके बावजूद नारायण ने उसे घर की दहलीज पार करने का जोखिम लिया था ।
यहां नारायण का परिवार मूलतः किसान परिवार था । उनका कर्म ही धर्म था । लेकिन नारायण ने इस सिद्धांत को एक दिन जमुनिया नदी में जाकर विसर्जित कर दिया था ।
मुझे यह तो पक्का विश्वास था कि नारायण शाम को हमारे घर आयेगा जरूर। लेकिन वो मुझे क्या बताने वाला है,यह नहीं मालूम । कुछ सोच सुबह का अखबार उठा लिया पर दिमाग में नारायण ही प्रेत की तरह छाया रहा….! दो साल पहले मैं भलमारा गया था नारायण के फूफा घर रिश्तेदारी को लेकर ! तभी जमुनिया नदी के किनारे उस मंदिर में भी गया था जहां नारायण हर गुरुवार को गुरू दर्शन के लिए जाना शुरू कर दिया था और पूजा पाठ भी करने लगा था । यधपि यह सब कुछ यकायक नहीं हुआ था । चार पांच साल की दुकानदारी में नारायण ने बहुत कुछ कमा लिया था । नगदी में जहां उसने हजारों जमा कर लिया था, वहीं गांव में एक अच्छा सा मकान बना लिया था । उसकी इस तरक्की की गांव में काफी तारीफ भी हो रही थी । यह सब कुछ हमने भी देखा और सुना था ।
लेकिन नारायण के आस पास जो कुछ घट रहा था वह तर्क से परे और अचंभित कर देने वाला था । उसे लगने लगा था जैसे वह एक नीरस जीवन जी रहा है ।
” कर्म के साथ यदि आदमी धर्म को जोड़कर न चले तो वह अपने कर्म पथ से भी एक दिन भटक जाता है और तब धीरे धीरे उसके जीवन में एक रेगिस्तान उगने लगता है !” अपने गुरु भाई सहदेव ठाकुर के मुख से सुनी यह बात नारायण के लिए एक नये संदेश की तरह ही था ।
सहदेव ठाकुर था तो खदान का मलकटा-लोडर पर अब वही नारायण का जैसे मार्ग दर्शक बन चुका था ।
वह एक न भूलने वाली शाम थी । नारायण मंदिर जा चुका था और उससे मिलना हमारे लिए बेहद जरूरी था । पुल बहुत बड़ा नहीं था । ऊंचा भी नहीं था । हां उसके नीचे एक पगडंडी सी जरूर बन गई थी । नदी किनारे एक बड़ा सा पत्थर था जो घिसकर चौकोर उठा हुआ था । बरसात के दिनों में नदी का पानी उस तक शायद पहुंचता होगा । उसके अगल बगल मरी -बिखरी घास इसका गवाह था ।
छोटे बड़े पत्थरों के बीच से घूमते हुए हम मंदिर तक पहुंच गये । शाम हो चुकी थी पर चांद की चांदनी से नदी का पानी मछली सा चमक चमक जाता था ।मन छल छल बहते पानी देख रोमांचित हो रहा था । तभी अंदर बरामदे से नारायण की आवाज आयी-” अंदर आ जाओ काकू -जूते उतार के …!”
जूते उतार हम अंदर तो चले गए लेकिन विशेष कर मेरा ध्यान जूते पर ही लगा रहा -” लिबर्टी ” की नयी जोड़ी थी । दूसरा कोई पहन चंपत न हो जाए !
अन्दर एक कोने में नारायण बैठा था । उसी के बगल में सहदेव ठाकुर भी बैठा हुआ था । इसके अलावे और कई बैठे हुए थे – भक्ति की मुद्रा में और सबों के बीच बैठे थे उन सबके गुरु श्री माली परमहंस ! गोरा थुलथुल बदन ! बाल साधारण न जटा न सफाचट ! मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि कहां बैठा जाए ! मंदिर में धूप अगरबत्ती की सुगन्ध चारों तरफ फैली हुई थी । नारायण ने खिसकते हुए मेरे लिए जगह बनाई । मैंने कब तक बैठना होगा के बारे में पूछा क्योंकि ज्यादा देर तक वहां बैठना मुझे मुश्किल लग रहा था। धूप अगरबत्तियों के जलने के बावजूद मंदिर के पिछवाड़े से सावन मास में बच्चे के बिछौने से आती दुर्गन्ध जो मंदिर के आस-पास से भी आ रही थी । उसने मुझे आरती लगने तक बैठने को कहा ।
” ऊं ..परम..तत्वायनमः नारायण गुरूभ्योनमः ! ” के साथ पूजा शुरू हुई जो आरती के बाद ” जय गुरुदेव ” के साथ खत्म हुई । पूजा के दौरान मैं आत्मप्रवंचना और उनके गुरु श्री माली परमहंस को ध्यान से देखता रहा था । क्योंकि उन दोनों पर ही मेरी कोई आस्था जम ही नहीं पा रही थी । नारायण अब भी गुरु वंदना में लीन था । लेकिन वहीं उसके गुरू भाई का मन विचलित लग रहा था मुझे । दोनों के हाथ में फूल थे और उनके गुरु कह रहे थे -” मेरे जीवन का सृजन एक विशेष लक्ष्य, एक विशेष चिंतन के लिए हुआ है और मेरा जन्म कोई आकस्मिक घटना नहीं है । तुम्हारे और मेरे जीवन का यह पहला परिचय नहीं है । मैंने तुम्हें पहली बार ही नहीं पहचाना है । तुम्हारे पिछले पच्चीस जीवन का हिसाब-किताब मेरे खाते में लिखा हुआ है । मैं तुमसे बहुत अच्छी तरह से परिचित हूं । इसीलिए मैं कहता हूं कि तुम केवल साक्षी भाव से जीवन को देखते रहो । ”
और लगा नारायण ने सचमुच अपना जीवन श्री माली परमहंस के चरणों में समर्पित कर दिया । एक जीवन को जिसके साथ और कई जिंदगियां जुड़ी हुई थीं । अब उसका जीवन-पद्धति बदल चुकी थी, कर्म क्षेत्र छोड़ धर्म ध्वजा वाहक बन चुका था वह और जय गुरुदेव उसका मूल मंत्र बन चुका था । दुकानदारी पीछे छुट चुकी थी । जिस दुकान में पहले सुबह शाम धूप दीप जलता था अब सप्ताह-सप्ताह तक बन्द रहती । बकाया का भुगतान रूक गया और नगदी रण्डी की तरह देह ऐंठकर आगे बढ़ जाने लगी । मतलब कि लेनदार तो सामने आते परन्तु देनदार दांयी-बांयी ताक-झांक करने लगे थे ।
इससे बेखबर आगे के कुछ सालों में नारायण ने कितने यज्ञ काण्डों में भाग लिया और कितने धूप दीप जलाये, देश के कोने-कोने में गया , उसे याद नहीं था ।कि इस मोक्ष मार्ग में कितना कुछ पाया और कितना कुछ खोया । जब जाना और आंख खुली तो सिर्फ टीसता हुआ इतना याद था कि इस गुरु देव के चक्कर में उसने कितने जीवन को मौत की चरखी में डाल दिया है । दुकान में बिक्री-बटटा पहले ही बंद हो चुका था और अब पत्नी की इज्जत पर बट्टा लगने का दौर शुरू हो गया था । छोटी छोटी जरूरतों के लिए उसकी पत्नी शकुंतला देवी इसके उसके दरवाजे पर खड़ी नजर आने लगी थी । किसी के यहां कुछ मिल जाता पर अधिकांश लोग टिका टिप्पणी से नहीं चूकते थे-” कैसी औरत है, जो मर्द को बांध कर नहीं रख सकी । “
जवाब में उसकी आंखें डबडबा आती थी । क्या जवाब देती और किस किस को क्या कहती- बताती । वह तो खुद ही अपनी किस्मत पर हैरान थी । गौतम बुद्ध का घर छोड़ना तो समझ में आता था । परन्तु अपने पति का दुकानदारी छोड़ भागना वह आज तक नहीं समझ पायी । अब तक वह जीवित थी तो बच्चों की खातिर । इन्हें वह किसके जिम्मे छोड़ जाती भला!
अपनी सारा जमा पूंजी को धर्म क्षेत्र में गंवाकर नारायण जर्जर जहाज की हालत में एक दिन भिखारियों के रूप में घर के बाहर आ खड़ा हुआ । जहां वह किसी से मदद लेने या मांगने के काबिल नहीं रह गया था । ऐसे में सबसे पहले आत्म हत्या का ख्याल उसके मन में आया । जिस जमुनिया नदी के किनारे की मंदिर में कभी उसने जय गुरुदेव की कसम खायी थी आज उसी नदी वाले पुल पर चढ़ छलांग लगाने सोच लिया पर यह कदम अनुकूल नहीं लगा था !
लेकिन नारायण ने ” अब न जियूं इस जगत में,सुन लो जग वालों ” की घोषणा कर दी और कीटनाशक दवा पी लेने को उद्धत हो उठा पर तभी एक मजदूर भोला जो कभी उसकी दुकान से तेल नून खरीदता था ने बीच बचाव कर कर्म ज्ञान की बात कह उसका घर वापसी पर जोर दिया था -घर की राह भेज दिया था ।
भोला ने उसे घरेलू जीवन में लौट आने को तो कह दिया था परन्तु दुकानदारी छोड़ जो राह उसने पहले चुनी थी -कैसी थी वो मुक्ति की राह ! नारायण के सामने एक रियलअंधभक्ति ! फिल्मी रील चल पडी थी । उसे याद आता है वह कोई त्योहार का दिन था । शायद दूर्गा पूजा का दिन । हर साल की भांति उस साल भी कोलियरी के आफिस मैदान में मेला लगा था । गाना बजाना , शोर ! बच्चे बूढ़े और नौजवानों की हंसी -ठिठोली से मेले का रंग सब पर चढ़ा हुआ था । महिलाओं की तो बात ही अलग थी । नारायण को आगे याद आती है । वह भी कितनी उमंग और खुशी के साथ पत्नी और इकलौते बेटे के साथ पहुंचा था मेले में । उसने पत्नी के हाथों फूलों की माला मां दुर्गा के गले पहनावा था और दोनों ने एक स्वर में कहा था-” मां एक बेटा तो दे दिया अब एक बेटी दे दो !” और दोनों बहुत खुश हुए थे । पर सालों हो गये थे इन सब से विरक्त हुए । और सालों हो गया पत्नी और बच्चों के लिए श्रृंगार और सलीके का कोई पहनावा खरीदे हुए । नारायण की आंखें पता नहीं क्यों भर आयीं थी पछतावे से-अपने आप से, आक्रोश से या पत्नी की सहनशीलता पर ! और बच्चे पता नहीं क्यों और कैसे उन मासूमों से आंखें मिला सकेगा ! उनकी पढ़ाई-लिखाई स्कूल का खर्च सब से तो विरक्त रहा था वह आज तक ! किस छलिए ने उनके जीवन को छला….! लेकिन अब नहीं …उसी पुलिया पर बैठे बैठे जैसे नारायण ने प्रण किया था .. नहीं, अब नहीं ! इस मोक्ष की माया में उसने सभी को दरिद्रता के जिस जाल में कस दिया था, उसे अब तोड़ना होगा । असल मोक्ष तो यही है! हां अब और नहीं ! पता नहीं उस क्षण कहां से ढेर सारी जिम्मेदारी और ढेर सारी शक्ति भर गयी थी नारायण के शरीर में !
शाम का धुंधलका पसरने लगा था और वह घर की ओर चल पड़ा था । दरवाजा अन्दर से बंद था । उसके हाथ सिकडी तक पहुंचते कि इससे पहले उसे भीतर से एक मर्दाना आवाज सुनायी पड़ी थी -” रोती क्यों हो शकुंतला.. मै तुम्हारा और तुम्हारे दोनों बच्चों का भी पूरा ख्याल रखता हूं कि.. नहीं ..! “
” फिर भी सहदेव बाबू …अब और नहीं..हाथ जोड़ती हूं…!”
तो यह सहदेव ठाकुर था । उसका गुरु भाई ! जिसने उसे बाबा से मिलवाया था और जो हमेशा उसकी पत्नी शकुंतला की सुंदरता की प्रशंसा किया करता था -नारायण को याद आता है । तभी आवाज ऊंची हो गई थी -” शकुंतला, मै तो तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूं, मगर समाज से डरता हूं । फिर न तुम खुश रह सकोगी,न लोग मुझे नौकरी करने देंगे ..!”
” लेकिन.. किसी दिन .. रमेश के पिता को यह सब पता चल गया तो..!”
नारायण ने दरवाजे की ओट से ही महसूस किया था डर और अनिशिंचतता में लिपटे हुए एक स्त्री, एक मां के समर्पण को ! सहदेव आगे कह रहा था-” मेरी रानी, नारायण तो अब सचमुच का नारायण हो गया है ..! उसे कहां मतलब रहा अब सांसारिक सुख और पारिवारिक झमेले से..मैबाबा से कहकर उसे अमराआवती की पहाड़ियों पर भेजवा रहा हूं…उसका जीवन तो अब बस साधना के लिए ही है…!”
” कमीने, मै कहीं नहीं जा रहा हूं..! वहां बाबा, योगिनो के साथ रंगरेलियां मना रहा है और यहां तू मेरी बीवी के साथ…!” धड़ाम से खुल गया दरवाजा । कमजोर सिकडी टूट गयी थी और इसी के साथ टूट गया था सहदेव और शकुंतला का आवेग भी !
कोने में रखा हंसुआ उठा लिया था नारायण ने । पर तभी चमत्कार हुआ था । शकुंतला गिर पड़ी थी नारायण के पैरों पर और जकड़ लिया था उसके घुटने को । वहीं का वहीं खड़ा रह गया था वह । सहदेव उसी तेजी से निकल भागा था कमरे से । शकुंतला विलाप भरे शब्दों में अनुनय किये जा रही थी-” मैं क्या करती .. अपनी भूख तो सह रही थी,पर बच्चों के आगे मुझे कुछ भी ध्यान नहीं रहा । तुम तो कंठी माला से लगे रहे । इधर बच्चों का नाम स्कूल से कट गया.. उनके कपड़े फट गये.. स्कूल से निकाले गये वे ..तब इसी सहदेव ने सहारा दिया था..!”
” सब दोष मेरा है रमेश की मां..! मैं ही भटक गया था..!” पैरों से उठा गले लगा लिया था नारायण ने शकुंतला को । कैसी ठंडक और कैसी राहत मिली थी उस घड़ी नारायण को । बहुत देर तक दोनों ऐसे ही आलिंगनबद्ध खड़े रहे । शकुंतला ने तब कहा था ” तुम लौट आये यही बहुत है !”
” हां..!” भूखा सा जवाब निकला था नारायण के मुंह से -” सब कुछ लुटा कर …!”
समाप्त !
श्यामल बिहारी महतो
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जिला बोकारो
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