बॉस इस ऑलवेज राइट…. अंग्रेज़ी में यह वाक्य कहावत नहीं, बल्कि आकाशवाणी की तरह आज भी चलता है, और शायद चलता रहेगा। लेकिन कांग्रेस को लेकर अहम, सवाल यह है कि पार्टी के नव निर्वाचित अध्यक्ष मल्लिका अर्जुन खरगे उक्त वाक्य के साथ कितना इंसाफ कर पाएंगे? पार्टी के प्रेसिडेंशियल चुनाव, जो करीब 24 साल के बाद हुए है में इस अस्सी वर्षीय अखंड कांग्रेसी नेता को क्लीन स्वीप मिलते हुए कुल गिरे 9072 वोटों में से 7829 वोट मिले हैं। उधर, उनके विरोध में खड़े पार्टी सांसद शशि थरूर के हक में 1072मत गए हैं। कांग्रेस के हितैषी मानकर चल रहे हैं कि पार्टी के अंदर चल रही पुरानी उठा पटक के जमाने अब लदने लगे हैं, लेकिन प्रश्न फिर भी वही है। ठीक हैं कि शशि थरूर ने खरगे को जीत की बधाई देकर एक खानापूर्ति, तो कर दी है, मगर क्या शशि थरूर इतने सीधे आदमी हैं? वे इतने विद्वान हैं कि उनके घोर विरोधी भी उनसे बात करते हुए दाएं बाएं देखने लगते हैं और इतने मुंह फट हैं कि उन्होंने आपकी अदालत प्रोग्राम में ज्येष्ठ पत्रकार रजत शर्मा को एक पाकिस्तानी महिला पत्रकार से अपने विवाविद संबंधों को लेकर यहां तक कह दिया था कि पूरी दुनिया में मेरी सौ गर्ल फ्रेंड्स हैं। इसी वाचलता के तहत वे पार्टी के लिए नित नई दिक्कतें खड़ी कर सकते हैं, जैसे दिग्विजय सिंह कुछ भी बोल दिया करने के लिए मशहूर हैं और कुछ नहीं तो वे राहुल यात्रा के दौरान कर्नाटक में नाचने ही लगे थे। फिर बयान दे दिया कि मैं, तो 75वर्षीय जवान हूं। शशि थरूर, जिनके लिए चुनाव के तत्काल बाद नारा उछाला गया कि देश के कोहिनूर शशि थरूर के बारे में कयास यह भी लगाया जा रहा है कि वे अच्छे से जानते थे कि उनकी हार तय है, तो भी वे अपनी हार को सस्ते में नहीं लेने वाले। उनका मीडिया में दिया गया एक बयान हरदम गौर करने लायक रहेगा कि I am not fighting against any particular person ,but i want to demolish so called Aala Caman Sanskriti in my party. And that is why I am looking forward to activate new generation in party. इसका हिंदी भावानुवाद हुआ मैं किसी व्यक्ति विशेष ( जाहिर है बुजुर्गवार अस्सी वर्षीय एम.खरगे)के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ रहा हूं, बल्कि पार्टी की आला कमान संस्कृति के खात्मे के लिए चुनावी मैदान में हूं। आला कमान तो नेहरू गांधी परिवार के अलावा कौन है? यही तो खास अंदर छिपी बात है। फिर वे कह रहे हैं कि पार्टी में युवा पीढ़ी को इसी लिए सक्रिय करना चाहते हैं। मतलब इसका यह भी, तो हो सकता है कि खरगे जैसे लोग अब चुक चुके हैं। अलहदा बात है कि थरूर की उम्र भी 66 वर्ष हो चुकी है। इसका मतलब यह भी निकाला जा रहा है कि शशि थरूर अभी भी कांग्रेस में नई रेखा खींच सकते हैं। सियासत में कोई कच्चा खिलाड़ी सीधे सीधे कुछ नहीं कहता। उलट बासी के अंतर्गत बात कह दी जाती है। इसलिए समझदार को इशारा काफी। संभव यह भी है कि थरूर को कुछ ले देकर मना लिया जाए। जैसे पहले कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता स्व. अर्जुन सिंह को पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया गया था। पता हो कि मध्य प्रदेश के भी पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके अर्जुनसिह भी रणनीति के मामले में चाणक्य भी कहे जाते थे। जितिन प्रसाद को भी यही तोहफा दिया गया। रोचक प्रसंग तब, (करीब 24साल पहले) यह हुआ था कि नई दिल्ली में अध्यक्ष पद के लिए इधर वोटिग चल रही थी और उधर जितिन प्रसाद एक बौद्धिक ठिकाने पर एक बुजुर्ग पत्रकार के साथ लंच कर रहे थे। तब उन्होंने उक्त पत्रकार से कहा था कि मुझे मालूम है कि मैं हार जाऊंगा, लेकिन …….! इसी लेकिन में यह राज छिपा था कि आगे चलकर उन्हें भी उपाध्यक्ष पद से नवाज दिया गया। सबसे बड़ा प्रश्न, तो यह है कि हिमाचल प्रदेश और गुजरात में अगले महीने विधान सभा के आम चुनाव होने हैं। दोनों ही जगह भाजपा सरकार है। हिमाचल में तो अगले महीने उक्त चुनाव हो जाने हैं, लेकिन आश्चर्य की बात है कि चुनाव आयोग ने गुजरात के चुनाओ के बारे में उफ तक नहीं की है। ज़ाहिर है कि ऐसी स्थिति में केंद्र , राज्य सरकार और चुनाव आयोग शंकाओं के घेरे में आ गए हैं।पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह लगातार अपने इस गृह प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। खासकर मोदी ने तो गुजरात को दीपावली से पहले ही जगमग कर दिया, जबकि उक्त सूबा देश में पर केपिटा इनकम में सबसे ज़्यादा होने के कारण वैसे ही खाए पिए लोगों का बसेरा माना जाता है। सबसे जरूरी है पिछले विधान सभा चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच हुई टक्कर। गुजरात में 2017 विधान सभा आम चुनाव में सरकार तो भाजपा की बनी थी, लेकिन इस पार्टी को मिली कुल 99 सीटें मिली थी और कांग्रेस को 80 यानी कांग्रेस सरकार बनाने से मात्र 19 सीटें पीछे रह गई थीं। गुजरात में कुल 182 सीटों पर वोट पड़े थे। कांग्रेस की इस सफलता ने भाजपा के हाथ पैर फुला दिए थे। जानकार कहते हैं कि आम आदमी या आप पार्टी के अध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने महीनों से इस बार अपना ठिकाना गुजरात को बना लिया है, जो निश्चित रूप से कांग्रेस के लिए ही नहीं, भाजपा के लिए खास अडंगा साबित हो सकता है, क्योंकि रेवड़ी किसे अच्छी नहीं लगती।केजरीवाल इसी तरह दिन में सपने भले दिखा कर भले कुछ सीटें हथिया लें, लेकिन गुजरात में गुजराती समुदाय की आस्मिस्ता और आत्म सम्मान का सवाल मोदी और शाह के साथ जुड़ा हुआ है। मोदी आज कुछ हैं वे गुजरात माडल की वजह से ही हैं, और उनके साथ पूरी भाजपा की नजर गुजरात के बहाने 2024 के आम चुनाव पर है। वैसे हिमाचल में पिछले साल हुए लोकसभा के एक उप और दो विधानसभा उप चुनावों में भाजपा खेत रही थी। हो सकता है आने वाले कल का राज उक्त आंकडो में भी छिपा हो।