बाल ठाकरे से उद्धव तक 6 बार टूटी शिवसेना, पर संभली भी

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अब तक शिंदे का वार सबसे ज्यादा घातक
मुंबई । महाराष्ट्र की राजनीतिक रणभूमि में शिवसेना, जिसके संस्थापक बाल ठाकरे थे और जिसकी कमान अब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के हाथों में है, एक बार फिर बड़े विभाजन के कगार पर खड़ी है। हालिया खबरों के अनुसार, पार्टी के 6 सांसद पाला बदलकर उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के खेमे में शामिल हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह 2022 में हुए सबसे बड़े विभाजन की यादें ताजा कर देगा, जिसने पार्टी के मूल स्वरूप को ही बदल दिया था। हालांकि, शिवसेना का इतिहास बताता है कि यह दल पहले भी कई बार टूट का सामना कर चुका है। 70 के दशक से लेकर 2026 तक, यह पार्टी छह बार बड़े संकटों से गुजरी है, जिनमें एकनाथ शिंदे का 2022 का वार सबसे घातक साबित हुआ है।
पहली टूट: प्रति शिवसेना बनी
70 के दशक में बंदू शिंगरे का विद्रोह शिवसेना के इतिहास की सबसे पहली टूट 70 के दशक में मानी जाती है। उस समय, दिवंगत संस्थापक बाल ठाकरे और मुंबई के एक स्थानीय नेता बंदू शिंगरे के बीच तनाव पैदा हुआ था। इस तनाव के परिणामस्वरूप, शिंगरे ने प्रति शिव सेना नाम से अपना एक अलग दल खड़ा किया। हालांकि, यह पहला विभाजन शिवसेना के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित नहीं हुआ और शिंगरे की पार्टी खास असर नहीं छोड़ पाई।
दूसरी टूट: छगन भुजबल भी हुए बागी
1991 में छगन भुजबल की बगावत दिसंबर 1991 में, जब पार्टी की कमान बाल ठाकरे के हाथों में ही थी, एक और बड़ा झटका लगा। वरिष्ठ नेता छगन भुजबल, जो उस समय महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष थे, ने पार्टी से बगावत का मन बना लिया। उन्होंने दावा किया कि उन्हें 18 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जबकि उस समय शिवसेना के पास कुल 52 विधायक थे। भुजबल की यह बगावत खास इसलिए भी मानी जाती है क्योंकि यह पहली बार था जब किसी इतने बड़े कद के नेता ने पार्टी में विरोध के सुर उठाए थे।
तीसरी टूट: नारायण राणे का पाला बदला
2005 में नारायण राणे का पाला बदलना लगभग 14 साल बाद, शिवसेना ने एक बार फिर नारायण राणे के रूप में टूट का सामना किया। राणे 1999 में कुछ महीनों के लिए मुख्यमंत्री भी रहे थे। कहा जाता है कि दिवंगत बाल ठाकरे द्वारा अपने बेटे उद्धव को उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाने की कोशिश से राणे खफा हो गए थे। जुलाई 2005 में उन्होंने शिवसेना छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया। उन्होंने दावा किया था कि उन्हें 42 विधायकों का समर्थन प्राप्त है, जबकि उस समय विधानसभा में शिवसेना के पास 63 विधायक थे।
चौथी टूट: राज ठाकरे हुए खफा
2006 में चचेरे भाई राज ठाकरे की राह अलग नारायण राणे के जाने के ठीक अगले साल, यानी 2006 में, शिवसेना के उत्तराधिकारी माने जा रहे राज ठाकरे ने भी अपनी अलग राह पकड़ ली। तब तक, पार्टी की कमान उद्धव ठाकरे को मिल चुकी थी। राज ठाकरे के जाने से हालांकि विधायकों का बड़ा समूह नहीं टूटा, लेकिन संगठन पर इसका गहरा असर पड़ा। उन्होंने अपनी अलग पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बनाई और 2009 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटें भी जीतीं।
पांचवी टूट: एकनाथ शिंदे ने दिखाए तेवर
2022 में एकनाथ शिंदे का सबसे घातक वार साल 2022 में शिवसेना ने अपने इतिहास का सबसे घातक विभाजन देखा। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के 55 में से 40 विधायक अलग होने के लिए तैयार हो गए। इस बड़े विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि राज्य में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई। इतना ही नहीं, पार्टी दो हिस्सों में बंट गई और चुनाव आयोग ने मूल पार्टी का नाम शिवसेना और उसका चुनाव चिह्न धनुष-बाण शिंदे गुट को दे दिया।
छठी टूट: बागी हुए 6 सांसद
2026 में शिवसेना (यूबीटी) में फिर संकट? अब, 2026 में शिवसेना (यूबीटी) एक बार फिर टूट के संकट का सामना कर रही है। ऐसी खबरें हैं कि पार्टी के 6 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को शिंदे गुट को समर्थन देने का पत्र दे दिया है, जिसका गुरुवार को आधिकारिक ऐलान हो सकता है। यदि यह बात सच साबित होती है, तो उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी के पास लोकसभा में महज 3 सांसद रह जाएंगे।