अल-नीनो का बढ़ता खतरा: भारत के लिए अगले पांच महीने चुनौतियों से भरे

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-कृषि एवं अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा सीधा प्रभाव
नई दिल्ली। भारत में इस वर्ष मॉनसून की शुरुआत उम्मीद से थोड़ी धीमी रही है, जिसने देश के कई हिस्सों में चिंता बढ़ा दी है। दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 2026 जून की शुरुआत में भले ही केरल पहुंच गया हो, लेकिन इसकी आमद सामान्य से कुछ विलंब से हुई, और प्रारंभिक बारिश भी कई क्षेत्रों में कमजोर दर्ज की गई है। मौसम वैज्ञानिकों ने अब एक गंभीर चेतावनी जारी की है। उन्होंने कहा है कि अल-नीनो का पूरा प्रभाव अभी तक देखा नहीं गया है, और आने वाले जुलाई से नवंबर तक के महीने भारत के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं, जिसका सीधा असर कृषि, जल संसाधनों और समग्र अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि 2026 में अल-नीनो जून में अपेक्षाकृत कमजोर रहेगा, लेकिन जुलाई-अगस्त में इसके मध्यम होने और सितंबर तक मजबूत होने की प्रबल संभावना है। एनओएए और आईएमडी जैसे प्रमुख मौसम संगठनों के अनुसार, जुलाई-अगस्त तक अल-नीनो के पूरी तरह विकसित होने की संभावना 80-90 प्रतिशत से भी अधिक है। पिछले कई दशकों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि अधिकांश अल-नीनो वर्षों में भारत को औसत से कम बारिश मिली है।
पिछले माह सामान्य से कम रही बारिश
जून 2026 के पहले दो हफ्तों में कई राज्यों में बारिश सामान्य से काफी कम रही। महाराष्ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्यों में 70-80 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि मध्य भारत और कुछ उत्तरी हिस्सों में भी बारिश का स्तर नीचे रहा। आईएमडी के अनुसार, जून महीने में भी औसत से कम बारिश रहने की संभावना है। मॉनसून की इस देरी और कमजोर शुरुआत ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि खरीफ फसलों की बुवाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है। अल-नीनो का असली और गहरा असर जुलाई से सितंबर के बीच दिखेगा, जब मॉनसून अपनी चरम अवस्था में होता है। यदि अल-नीनो मजबूत होता है, तो अगस्त-सितंबर में बारिश में और भी कमी आ सकती है। इससे देश के जलाशयों में पानी की कमी, नदियों के सूखने और भूजल स्तर में गिरावट जैसी गंभीर समस्याएं और विकराल रूप ले सकती हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अभी भी कृषि पर निर्भर है, जहाँ लगभग 50-60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती से जुड़ी हुई है। खरीफ सीजन (जून-सितंबर) में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालें जैसी महत्वपूर्ण फसलें बोई जाती हैं। कम बारिश से इन फसलों की पैदावार में भारी कमी आ सकती है। पिछले अल-नीनो वर्षों में सूखे के कारण किसानों की आय घटी, उन पर कर्ज का बोझ बढ़ा और कई जगहों पर आत्महत्या की घटनाएं भी बढ़ीं। 2026 में यदि बारिश 90 प्रतिशत या उससे कम रहती है, तो खाद्यान्न उत्पादन में 10-15 प्रतिशत की कमी आ सकती है, जिससे देश के सामने खाद्य सुरक्षा की बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी। ऐसी स्थिति में सरकार को अनाज का आयात बढ़ाना पड़ सकता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि इन इलाकों में वर्षा आधारित खेती अधिक होती है। छोटे किसान, जिनके पास सिंचाई की पर्याप्त सुविधा नहीं है, वे इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। पशुपालन भी प्रभावित होगा, क्योंकि चारे की कमी हो सकती है। कम बारिश का सीधा मतलब है जल संकट का गहराना। देश के कई शहरों और गांवों में पहले से ही पानी की समस्या है, और मॉनसून कमजोर रहने पर पीने के पानी, सिंचाई और उद्योगों के लिए पानी की कमी और बढ़ेगी। बिजली उत्पादन भी प्रभावित होगा, क्योंकि हाइड्रो पावर प्लांट पानी पर निर्भर करते हैं। अल-नीनो से तापमान में और वृद्धि हो सकती है, जिससे गर्मी पहले से ही रिकॉर्ड तोड़ रही है।