मैं उस प्रश्नपत्र का तीसरा प्रश्न हूँ,
जिसे समाज ने पढ़े बिना ही छोड़ दिया।
और मैं,
सारी उम्र उसी प्रश्न का उत्तर खोजता रहा।
मैंने देखा है,
कैसे सभ्यताएँ चाँद पर झंडे गाड़ती हैं,
और धरती पर मेरे लिए एक
कुर्सी तक खाली नहीं छोड़तीं।
मेरी हँसी को तमाशा समझा गया,
मेरी चाल को मज़ाक,
मेरी पहचान को गलती।
जबकि मैं न प्रकृति की भूल हूँ,
न ईश्वर की चूक।
मैं तो बस उस इन्द्रधनुष का रंग हूँ
जिसे तुम्हारी आँखें देखने की अभ्यस्त नहीं हैं।
मेरी हथेलियों की ताली में सिर्फ़
आवाज़ नहीं,
सदियों की भूख बजती है।
हर थपकी के साथ एक सपना टूटता है,
एक अपमान झरता है,
एक बुंद आँसू भीड़ में खो जाता है।
मैंने भी चाहे थे
कुछ बहुत साधारण से सपने
एक नाम,
जो तिरस्कार से न पुकारा जाए।
एक घर,
जिसका दरवाज़ा मेरे लिए भी खुले।
थोड़ी सी प्रेम,
जो मेरी पहचान से पहले मेरा दिल देखे।
एक समाज,
जो मुझे देखकर चेहरा न फेर ले।
पर दुनिया ने मुझे इंसान कम,
विवाद अधिक समझा।
सुनो!
मैं बस अपने हिस्से की धूप,
अपने हिस्से की हवा,
अपने हिस्से की ज़मीन वापस चाहता हूँ।
जिस दिन मेरी पहचान समाचार नहीं रहेगी,
जिस दिन मेरे अस्तित्व पर बहसें बंद हो जाएँगी,
जिस दिन मैं सिर्फ़ “मनुष्य” कहलाऊँगा
उसी दिन तुम्हारी सभ्यता
अपने सबसे सुंदर अर्थ में जन्म लेगी।
और तब मेरी ताली में दर्द नहीं,
जीवन बजेगा।
● अनुपमा कट्टेल
डिमापुर (नागालेण्ड)

