फ़िल्म समीक्षा : ‘सतलुज’ — एक नदी नहीं, इतिहास की मौन गवाही

मनोरंजन

कुछ फ़िल्में मनोरंजन के लिए बनती हैं, कुछ इतिहास को जीवित रखने के लिए। दलजीत दुसांझ अभिनीत ‘सतलुज’ दूसरी श्रेणी की फ़िल्म है। यह केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि पंजाब के उस दौर का सिनेमाई दस्तावेज़ है, जब 1980 और 1990 के दशक में उग्रवाद, आतंकवाद, पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार के प्रश्न एक साथ इतिहास के सबसे कठिन अध्यायों में दर्ज हो रहे थे।

फ़िल्म का केंद्रबिंदु मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा हैं, जिन्होंने उन परिवारों की आवाज़ बनने का साहस किया जिनके अपने अचानक लापता हो गए थे। उनकी पड़ताल में यह आरोप सामने आया कि अनेक अज्ञात शवों का पुलिस द्वारा अवैध रूप से अंतिम संस्कार किया गया। फ़िल्म इन्हीं घटनाओं को संवेदनशील और प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर प्रस्तुत करती है। यह दर्शक को किसी निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए बाध्य नहीं करती, बल्कि कठिन प्रश्नों के सामने खड़ा करती है।’सतलुज’ का सबसे बड़ा गुण इसकी संवेदनशीलता है। निर्देशक ने सनसनी फैलाने के बजाय घटनाओं को मानवीय दृष्टि से दिखाने का प्रयास किया है। कैमरा हिंसा का प्रदर्शन कम और उसके मानवीय परिणाम अधिक दिखाता है। यही कारण है कि फ़िल्म भावनात्मक रूप से गहरा प्रभाव छोड़ती है।

दलजीत दुसांझ ने अपने अभिनय से यह सिद्ध किया है कि वे केवल लोकप्रिय अभिनेता ही नहीं, बल्कि गंभीर विषयों को भी पूरी ईमानदारी से निभाने वाले कलाकार हैं। उनके चेहरे के भाव, संवादों का संयम और आंतरिक पीड़ा का चित्रण पात्र को विश्वसनीय बनाता है। सहायक कलाकार भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं।

इस फ़िल्म की सबसे बड़ी चर्चा इसके प्रदर्शन को लेकर भी रही। बताया जाता है कि इसे सेंसर बोर्ड द्वारा अनेक कट लगाने के निर्देश दिए गए, पंजाब में इसके प्रदर्शन को लेकर विवाद हुआ और ओटीटी पर आने के बाद भी यह बहुत कम समय में हटा दी गई। इन विवादों ने फ़िल्म को और अधिक चर्चा में ला दिया तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इतिहास और मानवाधिकार पर बहस को भी नया आयाम दिया।

फ़िल्म का अंत दर्शक को लंबे समय तक बेचैन रखता है। जसवंत सिंह खालरा के लापता होने और उनकी पत्नी द्वारा वर्षों तक न्याय के लिए लड़ी गई कानूनी लड़ाई यह याद दिलाती है कि सत्य की खोज कई बार बहुत बड़ी व्यक्तिगत कीमत माँगती है। बाद में न्यायालय द्वारा इस मामले में पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया जाना इस संघर्ष के ऐतिहासिक महत्व को और रेखांकित करता है।

‘सतलुज’ किसी पक्ष का प्रचार नहीं करती, बल्कि इतिहास के एक कठिन दौर से जुड़े मानवीय प्रश्नों को सामने रखने का प्रयास करती है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह फ़िल्म मनोरंजन से अधिक विचार, संवेदना और विमर्श की फ़िल्म है। इसे देखते समय दर्शक केवल एक कहानी नहीं देखते, बल्कि इतिहास, न्याय और मानवाधिकार से जुड़े जटिल सवालों का सामना भी करते हैं।

रेटिंग : ★★★★☆ (4.5/5)

कुमार धनंजय सुमन 

सोनवर्षा,थाना-बिहपुर,भागलपुर,बिहार 853गवाही