40 साल पहले सन्यास ले चुकी ननद को बनाया दहेज प्रताड़ना का आरोपी, अदालत ने निरस्त किया

इंदौर

इन्दौर अपर सत्र न्यायाधीश मनीष लोवंशी की कोर्ट ने अपील याचिका पर सुनवाई उपरांत दहेज प्रताड़ना मामले में निचली अदालत द्वारा एक ननद (साध्वी), जेठ और जेठानी के खिलाफ तय किए गए आरोपों को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। ननद ने वर्ष 1980 में ही सांसारिक जीवन त्याग कर वैराग्य अपना लिया था, और वे शिकायतकर्ता की शादी में भी शामिल नहीं हुई थीं।
मामले की मुख्य पृष्ठभूमि –

  • दर्ज शिकायत: इंदौर के एरोड्रम थाने में एक विवाहिता ने अपने पति और ससुराल पक्ष के अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ दहेज के लिए प्रताड़ित करने का मामला दर्ज कराया था।
  • पुलिस की कार्रवाई: पुलिस ने महिला की शिकायत के आधार पर न सिर्फ पति, बल्कि राजस्थान में रह रहे जेठ-जेठानी और 42 साल पहले बाल साध्वी बनी ननद को भी आरोपी बना दिया था।
  • निचली अदालत का रुख: प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी (JMFC) की अदालत ने पुलिस की चालान रिपोर्ट के आधार पर इन सभी दूर के रिश्तेदारों के खिलाफ आरोप तय कर दिए थे।
    कोर्ट में बचाव पक्ष के तर्क
    बचाव पक्ष के अधिवक्ता महेंद्र मौर्य ने अदालत के सामने निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे:
  • संसार से दूरी: आरोपी बनाई गई ननद ने वर्ष 1980 में ही बाल साध्वी के रूप में दीक्षा ले ली थी। उनका अपने मूल परिवार से कोई व्यावहारिक संबंध नहीं था।
  • विवाह में अनुपस्थिति: साध्वी ननद और राजस्थान निवासी जेठ-जेठानी शिकायतकर्ता की शादी या उसके बाद के किसी भी आयोजन में शामिल नहीं हुए थे।
  • बिना जांच के चालान: पुलिस ने बिना किसी जमीनी पड़ताल या सबूत के, केवल शिकायत में नाम होने के आधार पर इनके खिलाफ कोर्ट में चालान पेश कर दिया था।
    सत्र न्यायालय का अंतिम फैसला –
    अपर सत्र न्यायालय ने मामले के रिकॉर्ड और तर्कों की समीक्षा के बाद पाया कि पुलिस या शिकायतकर्ता के पास ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि इन तीनों रिश्तेदारों ने महिला को कब और कैसे प्रताड़ित किया। कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने की कार्रवाई को दोषपूर्ण माना और साध्वी, जेठ व जेठानी को इस केस से पूरी तरह बरी (आरोप निरस्त) कर दिया।