
डॉ. संतोष का काव्य-संग्रह ‘बेड़ियों को तोड़ने की सज़ा’ समकालीन हिन्दी काव्य-जगत में वर्ग-संघर्ष और सामाजिक न्याय-व्यवस्था के खिलाफ़ प्रतिरोध का एक सशक्त दस्तावेज़ है। इस संग्रह में समाज के हाशिए पर खड़े शोषित वर्ग की पीड़ा, शोषक के दबाव का दर्द और सत्ता की अमिट भूख के संघर्ष को अत्यंत बारीकी से उजागर किया गया है। अतः इस काव्य-संग्रह का मूल स्वर सदियों से चली आ रही सामाजिक न्याय-व्यवस्था का यथार्थ, अस्मिता, मानवीय संघर्ष और वैचारिक चेतना है।
काव्य की विषय-वस्तु कवियों द्वारा की जाने वाली कोरी कल्पना न होकर आम आदमी की भोगी हुई हकीकत है। कविताओं के केंद्र में वे लोग हैं जिनके पंख काटकर उन्हें दबा दिया जाता है—कभी पैसे की धौंस से तो कभी जातिगत दंभ से। समग्रतः यह दलित, पीड़ित, पिछड़े या गरीब लोगों की ‘ऑडियो बुक’ है। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ शोषित वर्ग सिर्फ़ दबा हुआ नहीं है, बल्कि तर्कशील होकर सवाल करता है। वर्ण-व्यवस्था पर प्रहार करते हुए कवि का वैज्ञानिक तर्क पाठक को आकर्षित करता है। यथा—
जब मुँह से पैदा हुए थे
तब हुए थे
अब तो वैसे ही पैदा होते हो
जैसे दूसरे लोग होते हैं।
फिर भेद कैसा?
यहाँ लेखनी से शोषण का कोई भी रूप अछूता दिखाई नहीं पड़ता। चाहे वह मानसिक शोषण हो, शारीरिक यातना हो या बौद्धिक शोषण, सभी स्तरों पर गहरा चिंतन-मनन व्यक्त हुआ है। बौद्धिक शोषण पर कवि ने बहुत सरलता से अपने भावों को सृजित किया है—
मेरे पुरुखों ने गीत लिखे
कभी अपने नाम का दावा नहीं किया…..
पर कुछ लोगों ने उसकी नकल की
शास्त्रीय नाम देकर उसे अपना बना लिया।
यह कृति भारतीय जाति-व्यवस्था की झाँकी है। इसे पढ़ने के पश्चात् जाति के आधार पर समाज में हो रहे व्यवहार के एक-एक पक्ष से रूबरू हुआ जा सकता है। चाहे महर्षि वाल्मीकि हों, हमारे संविधान-निर्माता डॉ. बी. आर. अम्बेडकर हों या महान सम्राट अशोक, सभी महान व्यक्तित्व भी जाति के आधार पर ही तौले जाते हैं। सभी जाति की चक्की में इस कदर पिसते आ रहे हैं कि उनका नाम लेने से ही एक वर्ग चिढ़ जाता है। जाति ही सब कुछ तय करती है—जेल में जीवन, कवि और लेखक की महानता, श्रेष्ठ पत्रकार, श्रेष्ठ शोधकर्ता, महान राजनेता, विद्वान प्रोफेसर, सब कुछ।
यह संग्रह उस सत्ता और राजनीतिक व्यवस्था पर भी प्रहार करता है जो ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की आड़ में पशुता की ओर लौट आती है। समकालीन राजनीतिक व्यवस्था की कुचलने की मानसिकता पर व्यंग्यार्थ द्रष्टव्य है—
उनका तोता इनका चील
उनका सियार इनका लकड़बग्गा
उनका हाथी इनका बुलडोज़र
उनका सिपाही इनका शूटर
येन-केन-प्रकारेण
विपक्षियों को ऐसे कुचलना है
जैसे कुचल रहा हिटलर यहूदियों को।
काव्य की भाषा सरल, सहज और आम लोगों की भाषा है। सरल वाक्यों में कवि ने बहुत गहरी बात कही है। कविताओं में न्याय, अस्मिता और बेड़ियों जैसे बिम्ब पाठक को अंतःकरण से प्रभावित करते हैं।
डॉ. वंदना सिंह
अस्सिटेंट प्रोफेसर (गेस्ट)
हिन्दी विभाग
गुरुकुल काँगड़ी (सम विश्वविद्यालय), हरिद्वार, उत्तराखण्ड
ईमेल – vandanasv14@gmail.com
दूरभाष – 7060584402

