इंदौर में बिना नया कॉरिडोर बनाए तीन गुना बढ़ेगी बिजली पारेषण क्षमता

इंदौर

:: बढ़ती मांग के बीच 132 केवी लाइनों का क्षमता उन्नयन शुरू; एचटीएलएस कंडक्टर लगेंगे, 14 फीडर बे भी होंगे अपग्रेड ::
इंदौर । इंदौर में बढ़ती बिजली मांग को देखते हुए मौजूदा ट्रांसमिशन नेटवर्क की पारेषण क्षमता करीब तीन गुना बढ़ाने का काम शुरू हो गया है। मध्यप्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी (एमपी ट्रांसको) 132 केवी की महत्वपूर्ण लाइनों में एसीएसआर पैंथर कंडक्टरों की जगह हाई टेम्परेचर लो सैग (एचटीएलएस) कंडक्टर लगा रही है। इससे नया ट्रांसमिशन कॉरिडोर बनाए बिना मौजूदा लाइनों से अधिक बिजली का पारेषण संभव होगा।
ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने बताया कि इंदौर के तेजी से हो रहे शहरी विस्तार के बीच नए ट्रांसमिशन कॉरिडोर के लिए राइट ऑफ वे उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण है। इसलिए मौजूदा कॉरिडोर की क्षमता बढ़ाने की तकनीक अपनाई जा रही है। इससे बढ़ते पावर फ्लो को संभालने और भविष्य की विद्युत मांग के अनुरूप ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
:: चंबल से दोनों जोन तक 132 केवी लाइनों का उन्नयन ::
पहले चरण में खंडवा रोड स्थित 220 केवी इंदौर साउथ जोन सबस्टेशन से 132 केवी चंबल सबस्टेशन तक जाने वाले दोनों सर्किट का उन्नयन किया जा रहा है। इनमें इलेक्ट्रॉनिक कॉम्प्लेक्स और सत्य साईं सर्किट शामिल हैं। इसके साथ सांवेर रोड स्थित 220 केवी इंदौर नॉर्थ जोन सबस्टेशन से 132 केवी चंबल सबस्टेशन, पोलोग्राउंड को जोड़ने वाले दोनों सर्किट में भी कंडक्टर बदले जा रहे हैं।
कंडक्टर बदलने के साथ नेटवर्क से जुड़े 14 फीडर बे भी अपग्रेड किए जाएंगे। चंबल, इंदौर साउथ जोन, इंदौर नॉर्थ जोन, इलेक्ट्रॉनिक कॉम्प्लेक्स और सत्य साईं सबस्टेशन के फीडर बे इसमें शामिल हैं। बढ़ी हुई करंट वहन क्षमता के अनुरूप स्विचयार्ड और फीडर बे के उपकरणों को भी उन्नत किया जाएगा।
:: अधिक तापमान में कम सैग के साथ काम करेगा एचटीएलएस ::
एचटीएलएस कंडक्टर पारंपरिक एसीएसआर कंडक्टरों की तुलना में अधिक तापमान पर काम कर सकते हैं और उच्च तापमान में भी इनका सैग अपेक्षाकृत कम रहता है। इससे मौजूदा लाइनों से अधिक विद्युत शक्ति का पारेषण संभव होगा।
एमपी ट्रांसको के अनुसार क्षमता उन्नयन से महत्वपूर्ण लाइनों पर लोडिंग का बेहतर प्रबंधन होगा और पावर फ्लो के लिए अतिरिक्त ऑपरेशनल मार्जिन मिलेगा। इससे इंदौर और आसपास के क्षेत्रों की बढ़ती विद्युत आवश्यकता के अनुरूप मौजूदा ट्रांसमिशन नेटवर्क का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा।