आईआईटी इंदौर की अप्सरा बाला और प्रो. निर्मला मेनन के शोध में दिल्ली के धरना स्थलों का ऐतिहासिक विश्लेषण; पहुंच, दृश्यता और सार्वजनिक जगहों की उपलब्धता को बताया अहम ::
इंदौर । लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन की प्रभावशीलता इस बात से भी जुड़ी होती है कि प्रदर्शन स्थल सत्ता के केंद्रों से कितना करीब है, वहां तक आम लोगों की पहुंच कितनी आसान है और आंदोलन को कितनी सार्वजनिक दृश्यता मिलती है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) इंदौर की अप्सरा बाला और प्रो. निर्मला मेनन के शोध में दिल्ली के धरना स्थलों के ऐतिहासिक बदलावों का विश्लेषण कर सार्वजनिक स्थानों की भूमिका और लोकतांत्रिक भागीदारी के संबंध को रेखांकित किया गया है।
रिमागिनिंग पब्लिक स्पेसेस थ्रू सिटी लिटरेचर ऑफ़ दिल्ली : मैपिंग द हिस्ट्री, प्रेजेंट कंसर्नस एंड फ्यूचर ट्रांस्फ़ॉर्मेशन्स शीर्षक वाला यह शोध दिल्ली में मुगलकाल, ब्रिटिश शासन और आजादी के बाद सार्वजनिक स्थानों के बदलते सामाजिक-राजनीतिक महत्व को सामने लाता है। अध्ययन के अनुसार, राजपथ, जिसे अब कर्तव्य पथ कहा जाता है और ब्रिटिश शासन के दौरान किंग्सवे के नाम से जाना जाता था, विभिन्न जनसमूहों के विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र रहा। यहां किसानों, औद्योगिक श्रमिकों और अलग राज्य की मांग करने वाले समूहों ने अपनी मांगें उठाईं।
शोध में बताया गया है कि बोट क्लब क्षेत्र में सामूहिक प्रदर्शनों पर प्रतिबंध के बाद 1993 में जंतर-मंतर को दिल्ली के आधिकारिक प्रदर्शन स्थल के रूप में निर्धारित किया गया। इस बदलाव के संदर्भ में अध्ययन प्रदर्शन स्थलों और सत्ता के प्रमुख केंद्रों के बीच दूरी, नागरिकों की पहुंच और आंदोलनों की दृश्यता से जुड़े सवाल उठाता है।
:: शाहीन बाग से किसान आंदोलन तक बदले विरोध के ठिकाने ::
अध्ययन में 2017 के रामलीला मैदान के प्रदर्शनों, 2019-20 में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में हुए शाहीन बाग आंदोलन और 2021-22 के किसान आंदोलन का भी उल्लेख किया गया है। सिंघु, टिकरी और गाजीपुर में हुए किसान प्रदर्शनों के उदाहरणों के जरिए बताया गया है कि स्थापित प्रदर्शन स्थलों के अलावा दूसरे स्थान भी आंदोलनों के केंद्र बन सकते हैं।
शोधकर्ता इस प्रक्रिया को तीन अवधारणाओं – प्रतिबंध, निर्धारण और नए स्थलों के निर्माण के माध्यम से समझाते हैं। प्रतिबंध के तहत सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच सीमित की जाती है। निर्धारण में प्रशासन किसी क्षेत्र को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल घोषित करता है, जबकि नए स्थलों का निर्माण तब होता है, जब प्रदर्शनकारी अन्य स्थानों पर जुटकर आंदोलन का केंद्र बनाते हैं।
:: सार्वजनिक स्थानों की घटती उपलब्धता पर चिंता ::
शोध में साहित्यिक विश्लेषण के साथ वास्तुशिल्पीय अध्ययन, हाथ से बनाए गए नक्शों और डिजिटल मैपिंग का उपयोग किया गया। कथा साहित्य, गैर-काल्पनिक लेखन, कविता और दृश्य सामग्री के जरिए सार्वजनिक स्थानों के उपयोग तथा उनके बदलते सामाजिक-राजनीतिक महत्व को समझने का प्रयास किया गया।
अध्ययन में सार्वजनिक स्थानों की घटती उपलब्धता और बढ़ते निजीकरण को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया गया है। शोध के अनुसार, सार्वजनिक स्थल केवल आवागमन और मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, सामूहिक कार्रवाई और नागरिक भागीदारी के लिए भी जरूरी हैं।
:: केवल प्रदर्शन स्थल तय करना पर्याप्त नहीं ::
शोध का प्रमुख निष्कर्ष है कि किसी स्थान को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल घोषित कर देना नागरिकों को समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त नहीं है। वहां तक पहुंचने की सुविधा, भौगोलिक स्थिति और सत्ता के केंद्रों से निकटता भी महत्वपूर्ण हैं। ये पहलू प्रभावित कर सकते हैं कि विरोध-प्रदर्शन कितने व्यापक रूप से दिखाई देते हैं और उनकी मांगें सार्वजनिक विमर्श तक किस हद तक पहुंच पाती हैं।

