अक्षत

साहित्य
रुप मनोहर,मृदुल छवि,मंद-मंद मुस्कान|
कजरारे कारे नयन, वारा मैं भगवान |
पौत्र हमारा लाड़ला,अक्षत इसका नाम |
मोद सहित जब गोद लूँ,पाऊँ चारो धाम |
चंदा की आभा लिए आया मेरे द्वार।
तूने मुझको दे दिया दादा का अधिकार
किलकारी तेरी सुनी, मन में उठी उमंग।
बचपन मेरा आ गया खेलूं तेरे संग।।
मेरे दिल हो गया अब तेरा अधिकार।
मूल से बढ़ कर मानते सभी सूद से प्यार।।
मन का तू मोती मेरा, तू खुशियों की खान।
तू मुझको अनमोल है, जैसे मेरी जान।।
अक्षत तू अक्षत रहे ,अक्षत हो यश लाल |
अक्षत कर दो वंश को ,मनोहर के भाल |
मीना शर्मा ,
साहित्य प्रेमी कवि
हरदा

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