सर्द रात

अभी कोहरा पूरी तरह हटा भी नहीं था कि घड़ी ने शाम के चार बजा दिए थे ।सूरज जैसे कि अपने बिस्तर में से ही उचक – उचक कर आसमान में झांक लेता हो कभी- कभी ,कुछ मौसम का मिजाज भी उलझा-उलझा सा बन गया था ।धूप का नामो- निशान तक न था।

सुमंत की नज़र घड़ी पर टिक गयी।कब पांच बजे और वह काम से फारिग होकर घर चले। उसका काम ठेके पर फर्नीचर बनाने का था इसलिए उसके लिए शाम के पांच बजने का बड़ा महत्व था। उसने जल्दी-जल्दी लकड़ी पर रंदा चलाया।चार – छह तख़्ते अगले दिन के लिए चिकने करके रख दिये थे उसने,नहीं तो मालिक उसे पांच बजे के बाद भी ये कहकर काम में अटकाए रहता  कि, किया क्या ?किस बात के रुपये हुए? झिक – झिक होती सो अलग!

उसने आज जल्दी से मनोहर शर्मा से अपनी दिहाड़ी के रुपये लिए और घर की तरफ चल पड़ा।रास्ते में साइकिल उस से खींची न जाती थी कि तभी उसने चौराहे पर बदलू को ठिठुरते हुए देखा।

क्यों रे बदलू !आज फिर सर्दी में बाहर घूम रहा है । हां, अब चाय की दुकान का मालिक दुकान में सोने नहीं देता इसलिए आज तो लगता है आसमान के नीचे ही सोना पड़ेगा ।बदलू ने अनमने होकर बताया।  मगर तेरे पास तो रजाई भी नहीं है सुमंत ने आशंकित होते हुए कहा।

अब क्या कहूँ,बदलू इतना कहकर मुस्कुरा दिया।

सुमंत फिर वहां और देर खड़ा न रह सका ।वह आगे बढ़ गया मगर रास्ते में सोचता जाता था ,पता नहीं कैसे बदलू रात काटेगा।कुछ ही देर में उसने महसूस किया कि उसके पांव अब साइकिल के पैडल पर तेजी से घूम रहे थे वह थोड़ी ही देर में बदलू के सामने खड़ा था ,बदलू अपना सामान समेटकर चाय की दुकान से निकलने ही वाला था कि उसने बदलू को आवाज दी।

अरे बदलू,इधर आ तो–बदलू उदास मन से उसकी तरफ चला आया

क्या हुआ भैया,उसने सुमंत से पूछा अरे हुआ कुछ नहीं,ये रुपये रख ले और सुन नुक्कड़ वाली दुकान से एक रजाई लेके श्यामा की धर्मशाला में रुक जाना,लेटने भर को तो जगह दे ही देगा वो ,नहीं तो मेरा नाम लेके कह देना कि मैंने कहा है तुझे सोने की जगह दे दे।

बदलू के पूरे शरीर में गर्माहट आ गयी थी उसकी मुस्कुराहट थोड़ी और चौड़ी हो गयी थी उसने अपनी मुट्ठी में  कसके रुपये दबाए और सुमंत के गले लग गया।आज सुमंत खाली हाथ घर जा रहा था मगर उसका दिल खुशी से भरा हुआ था।

अंशु प्रधान

चेन्नई