चंद्रयान 3 को चंद्रमा पर पहुंचने में लगेंगे 40 दिन, साफ्ट लैं‎डिंग है वजह

नई दिल्ली । चंद्रयान-3 अपने ‎‎मिशन में कामयाब होने के ‎लिए 40 ‎दिन लगाएगा। इसकी वजह वैज्ञा‎निकों ने साफ्त लैं‎डिंग बताई है। गौरतलब है ‎कि चंद्रयान 3 ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक चांद की ओर अपने कदम बढ़ा ‎लिए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने हेवी-लिफ्ट एलवीएम3-एम4 रॉकेट का उपयोग करके अपना तीसरा चंद्र मिशन लॉन्च किया -जो अपनी कक्षा में सबसे बड़ा और भारी है, जिसे फैट बॉय करार दिया गया है। इसरो प्रमुख सोमनाथ ने कहा कि बाहुबली रॉकेट ने चंद्रयान-3 को सटीक कक्षा में स्थापित किया। अमेरिका और रूस को चांद पर पहुंचने में महज चार दिन ही लगे थे। लेकिन चंद्रयान-3 यानी भारत को चांद पर पहुंचने में 40 दिन लग जाएंगे। वैज्ञा‎निकों का कहना है ‎कि पिछली सदी में 1959 में सोवियत यूनियन का लूना 1 चंद्रमा पर पहुंचने वाला पहला मनुष्य निर्मित यंत्र था ‎जिसकी पहली बार सॉफ्ट लैंडिंग करके इतिहास रचा था लेकिन 3 साल बाद 20 जुलाई 1969 की तारीख को इंसान ने चांद पर कदम रखे थे। 1969 को दुनिया की सांसे थम सी गई थी जब अपोलो 11 मिशन के जरिए पहली बार चंद्रमा पर कदम पड़े थे। जुलाई 1969 में अमेरिका के अंतरिक्ष यात्रियों ने कदम रखा था तो इसी साल भारत ने अंतरिक्ष खोज के लिए अपना कदम बढ़ाया था। 15 अगस्त 1969 को भारत के आजादी के 22 साल पूरे हुए थे और विक्रम सराभाई इसरो की स्थापना की थी।
गौरतलब है ‎कि दो चंद्रयान लॉन्च करने के बाद भारत ने 14 जुलाई को तीसरा चंद्रयान का सफल प्रक्षेपण कर दिया है। 14 जुलाई को दोपहर ढाई बजे चंद्रयान मिशन लॉन्च किया गया। अगर चांद पर साफ्ट लैंडिंग में सफलता मिली तो अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत ऐसा करने वाला चौथा देश बन जाएगा। चंद्रयान अपने लॉन्च के एक महीने बाद चंद्र कक्षा में पहुंचेगा। इसके लैंडर और ग्रोवर के 23 अगस्त को चंद्रमा पर उतरने की संभावना है। यानी चंद्रयान-3 को चांद पर पहुंचने में एक महीने से भी ज्यादा का वक्त लगेगा। रॉकेट की डिजाइनिंग, इस पर खर्च होने वाले ईंधन और चंद्रयान की स्पीड में इसका जवाब छिपा है। स्पेस में लंबी दूरी तय करने के लिए यान को ले जा रहे रॉकेट की तेज स्पीड और सीधे प्रक्षेपण पथ की जरूरत होती है। अपोलो 11 की लॉन्चिंग के लिए नासा ने सैटर्न बी का इस्तेमाल किया था, जो सुपरहेवी लिफ्ट लॉन्चर था।
चांद की 3 लाख 84 हजार किलोमीटर की दूरी को तय करने के लिए नासा के रॉकेट ने चार दिनों का वक्त लिया था। हालांकि उस दौरान नासा ने इसमें 185 मिलिनयन डॉलर की रकम इस मिशन पर खर्च की थी। इसके उलट भारत ने इतने ताकतवर रॉकेट का इस्तेमाल नहीं किया। बजट भी 600 करोड़ रुपए का रहा है। चंद्रयान-3 के 23 या 24 अगस्त को चंद्रमा पर पहुंचने की उम्मीद है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव सूरज की रोशनी के बिना कई दिनों तक रह सकता है – जिससे लैंडर से जुड़े सौर पैनलों को चार्ज करना असंभव हो जाता है। जानकारी के मुताबिक, अगर चंद्रयान-3 अगस्त की 24 तारीख से चूक जाता है, तो उसे सॉफ्ट-लैंडिंग के लिए सितंबर तक इंतजार करना होगा।