मप्र के उदयपुर में है नटराज की 27 फीट लम्बी प्रतिमा
सावन का पवित्र मास चल रहा है और इसमें भगवान भोलेनाथ की आराधना का विशेष महत्व है। यूं तो विश्व के अनेक स्थानों पर भोलेनाथ की अनेक रूपों में भव्य प्रतिमाएं हैं, लेकिन मप्र के विदिशा जिले में उदयपुर ग्राम में 11 वीं शताब्दी की विशाल नटराज प्रतिमा इनमें से अद्वितीय है। एक ही शिला पर बनी यह करीब 27 फीट लम्बी और 14 फीट चौड़ी प्रतिमा इतनी भारी है कि प्रयास के बावजूद यह प्रतिमा उठाकर खड़ी नहीं की जा सकी। यही कारण है कि सदियों से महादेव अपने नटराज रूप में यहां पहाड़ी की तलहटी में लेटे हुई मुद्रा में ही दर्शन देते हैं। भारत ही नहीं बल्कि विश्व में भी संभवत: महादेव के इस नटराज स्वरूप की यह सबसे विशाल प्रतिमा है। बता दें कि उदयपुर 11 वीं शताब्दी के परमार राजा उदयादित्य द्वारा निर्मित विख्यात नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर के लिए जाना जाता है, लेकिन उसी ग्राम में परमारकाल की ही इस प्रतिमा के बारे में अधिकांश लोगों को जानकारी नहीं है, यही कारण है कि दूर तक जाने के बावजूद दर्शनार्थी महादेव के इस नटराज रूप की विशाल प्रतिमा के दर्शन को नहीं जा पाते।
विदिशा जिले के ग्राम उदयपुर से मात्र एक किमी दूर मुरादपुर की ओर जाने वाले मार्ग पर पहाड़ी की तलहटी में एक विशाल शिला पर लेटी हुई स्थिति में नटराज की प्रतिमा बहुत ही महत्वपूर्ण है। करीब 11 वीं शताब्दी की यह भव्य प्रतिमा मप्र राज्य पुरातत्व विभाग के अधीन है। प्रतिमा की नटराज के रूप में पहचान न हो पाने तथा विशाल प्रतिमा होने के कारण लोग इसे सामान्य भाषा में लोग रावणटोल भी कहते थे , जबकि यह प्रतिमा महादेव के नटराज स्वरूप की है। यह प्रतिमा पहाड़्ी में दबी एक ही शिला पर उकेरी गई है। इसकी लंबाई करीब 27 फीट, चौडई करीब 14 फीट और शिला की मोटाई करीब साढ़े चार फीट तक है। नटराज की विशाल प्रतिमा बनाते समय शिल्पी ने जटामुकुट वाले करीब 6 फीट के शीश का निर्माण किया, गले में नागमाला और छह हाथ वाली यह प्रतिमा अस्त्र शस्त्रों के साथ मौजूद है। प्रतिमा इतनी विशाल है कि लेटी हुई अवस्था में होने के कारण इसे एक बार में पूरा नहीं देखा जा सकता। इसमें नटराज शिव अपने पैरों के नीचे एक दानव को दबाए हुए है। लेकिन नीचे का यह निर्माण अधूरा सा प्रतीत होता है। संभवत: शिल्पी यह निर्माण पूरा नहीं कर पाए थे। उस समय यह उम्मीद होगी कि उदयेश्वर महादेव की इस नगरी में महादेव की इतनी भव्य और विशाल प्रतिमा खड़ी की जाए जो कई मील दूर से ही दिखाई दे, यही सोचकर शिला पर नटराज को आकार देने का काम शिल्पियों ने शुरु किया होगा लेकिन उनका यह स्वप्र पूरा नहीं हो पाया और जब प्रतिमा का निर्माण लगभग पूर्ण हुआ होगा तब इसे उठाने के प्रयास किए गए होंगें लेकिन यह शिला उठाई नहीं जा सकी। नटराज की इस विशाल प्रतिमा के पास ही कुछ स्तंंभ और अन्य सामान ऐसे मिले हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि इस प्रतिमा को उठाने के भरसक प्रयास हुए, लेकिन उठाया नहीं जा सका। यही कारण है कि नटराज की यह विशालतम प्रतिमा सदियों से पहाड़ी की तलहटी में लेटी हुई अवस्था में मौजूद है।
—
गोविंद सक्सेना, विदिशा
—

