-मानव तस्करी के मामलों में ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र
नई दिल्ली । देश में बच्चों के बढ़ते अपहरण के मामलों पर लगाम लगाने के लिए कानून सख्त करने की मांग वाली जनहित याचिका बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई है। वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में संगठित गैर-कानूनी गोद लेने के रैकेट, अंतरराज्यीय चाइल्ड ट्रैफिकिंग नेटवर्क, और शोषण, अंगों की ट्रेडिंग व मेडिकल ट्रायल के लिए बच्चों के बड़े पैमाने पर अपहरण पर गंभीर चिंता जाहिर की गई।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस लापता, किडनैप हुए और अगवा किए गए बच्चों के मामलों में तत्काल एफआईआर दर्ज करने और त्वरित जांच करने में असफल रही है। देर से जांच और लंबे ट्रायल के कारण संगठित किडनैपिंग माफिया को अपना गैर-कानूनी धंधा फलने-फूलने में मदद मिलती है। इस संबंध में, याचिकाकर्ता ने कई अहम मांगें की हैं, जिसमें बच्चों के अपहरण की जांच एसीपी या एसएचओ स्तर के अधिकारी से कराने की बात प्रमुख है। इसके अतिरिक्त, अपहरण के मामलों को एक साल के भीतर निपटाने के लिए एमएलए-एमपी कोर्ट की तर्ज पर विशेष अदालतों के गठन और अपहरणकर्ताओं के परिवार के सदस्यों की संपत्ति जब्त करने का आग्रह किया गया है।
दायर याचिका में बिहार के चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे गए हैं, जहां 2013 से प्रति वर्ष लगभग 15,000 लापता मामले दर्ज होते हैं, जिसमें अधिकांश बच्चे होते हैं और उनमें से मुश्किल से 50 प्रतिशत ही मिल पाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि मानव तस्करी के सर्वाधिक मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में दर्ज होते हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी में ओडिशा और फिर बिहार शीर्ष पर हैं, जबकि लड़कियों की तस्करी में राजस्थान में सर्वाधिक मामले आते हैं। इन बच्चों को अक्सर भीख मांगने, बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति या अन्य गैर-कानूनी गतिविधियों में धकेला जाता है। याचिका में हालिया मामले का भी उल्लेख किया गया है, जहां 5 जून 2026 को दिल्ली पुलिस ने 13 लोगों को गिरफ्तार किया था। यह गिरोह दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे पांच राज्यों में सक्रिय था, जो आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्ल्यूएस) और गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) परिवारों के नवजात बच्चों को अगवा कर 8 से 10 लाख रुपये में बेचता था।

