मन!!!!!आकाशगंगा
हृदय के भीतर न जाने कितने ब्रह्मांड बसते हैं। विचार कभी ग्रह बनकर परिक्रमा करते हैं, कभी टूटते तारों-से बिखर जाते हैं। कुछ स्मृतियाँ चाँद की शीतलता बनकर ठहरती हैं, तो कुछ इच्छाएँ सूर्य-सी दहकती रहती हैं। और मन इन्हीं अनगिनत आकाशगंगाओं में भटकता है। और जो शब्दों में उतर आता है, आपके पास चला […]
Continue Reading
